फिर चउरासी लख्ख, जोणि लद्धौ मानुष जम।

सो निसफल गंवाइ, मूढ कीजइ सुकृत क्रम।

कनक कचोली मज्झि, मूढ भरि छारिन नाखिसि।

कल्पवृक्ष उख्खेलि, मूढ एण्डम रख्खिसि।

वायस्सि उडावण कारणौ, चिंतामणि क्यों रालियै।

छीहल कहै पीयूष सौं, नाऊ पांव पखालियै॥

स्रोत
  • पोथी : कविवर बूचराज और उनके समकालीन कवि ,
  • सिरजक : छीहल ,
  • संपादक : डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल ,
  • प्रकाशक : श्री महावीर ग्रंथ अकादमी, जयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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