फिर चउरासी लख्ख, जोणि लद्धौ मानुष जम।
सो निसफल न गंवाइ, मूढ कीजइ सुकृत क्रम।
कनक कचोली मज्झि, मूढ भरि छारिन नाखिसि।
कल्पवृक्ष उख्खेलि, मूढ एण्डम रख्खिसि।
वायस्सि उडावण कारणौ, चिंतामणि क्यों रालियै।
छीहल कहै पीयूष सौं, नाऊ पांव पखालियै॥