दरबु गाडि जिन धरहिं, धरो किछु काम आवइ।

विलसि लाहो लेइ, सु तो पाछै पछतावइ।

नर नरिंद नर भुवनि, संचि संपइ जे मूवा।

तै वसुधा मैं बहुरि, जनमि सूकर कै हूवा।

धनकाज अधोमुख दसन सिउं, धरणि विदारहि रयणि दिन।

छीहल्ल कहइ सोचत फिरै, कहू पावहिं पुण्य बिण॥

स्रोत
  • पोथी : कविवर बूचराज और उनके समकालीन कवि ,
  • सिरजक : छीहल ,
  • संपादक : डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल ,
  • प्रकाशक : श्री महावीर ग्रंथ अकादमी, जयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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