छाया तरुवर पिख्खिं, आइ बहु बसै विहगम।

जब लगि फळ सम्पन्न, रहैं तब लगि इक संगम।

विहवसि परि अवथ्थ, पत्त फळ झरै निरंतर।

खिण इक तथ्थ रहइ, जाहि उडि दूर दिसंतर।

छीहल कहै द्रुम पखि जिम, महि मित्त तणु दब्ब लगि।

पर कज्ज कोऊ वल्ल हौ, अप्प सुवारथ सयल जगि॥

स्रोत
  • पोथी : कविवर बूचराज और उनके समकालीन कवि ,
  • सिरजक : छीहल ,
  • संपादक : डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल ,
  • प्रकाशक : श्री महावीर ग्रंथ अकादमी, जयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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