छाया तरुवर पिख्खिं, आइ बहु बसै विहगम।
जब लगि फळ सम्पन्न, रहैं तब लगि इक संगम।
विहवसि परि अवथ्थ, पत्त फळ झरै निरंतर।
खिण इक तथ्थ न रहइ, जाहि उडि दूर दिसंतर।
छीहल कहै द्रुम पखि जिम, महि मित्त तणु दब्ब लगि।
पर कज्ज न कोऊ वल्ल हौ, अप्प सुवारथ सयल जगि॥