गरब कर गुणहीन, अरे कंचन के गिरवर।

तो समीपि पाखाण, अथ्थि तरुवर ते तरुवर।

किये अप्प अमान, वृथा गुरुवत्तण तेरउ।

मलयाचल सलहीजै, सुजस तस संगति केरउ।

कटु तिक्त कुटिल परिमल रहित, तरू अनंत जे वन थया।

श्रीखंड संगि छीहल कहइ, ते समस्त चंदन भया॥

स्रोत
  • पोथी : कविवर बूचराज और उनके समकालीन कवि ,
  • सिरजक : छीहल ,
  • संपादक : डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल ,
  • प्रकाशक : श्री महावीर ग्रंथ अकादमी, जयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै