नीच सरिस नहीं प्रीति, बैर कीजइ अवस करि।

मध्य भाइ आछियै, संग छांडिय दूरंतरि।

हित अथवा अनहित, चित चिंतवै बुरि मति।

निसचय सुख की हानि, दुख्ख उपजै दहूं गति।

छीहल कहै पिख्खहु प्रगट, कर अंगारहिं कोउ धरै।

दाझै निबद्ध तातौ लियै, सीरौ कारौ कर करै॥

स्रोत
  • पोथी : कविवर बूचराज और उनके समकालीन कवि ,
  • सिरजक : छीहल ,
  • संपादक : डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल ,
  • प्रकाशक : श्री महावीर ग्रंथ अकादमी, जयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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