मधि त्रेताजुग चैत्रमास, सक्रंति-मेखि सरि।
करक लगन पख सुकळ, धरा पन्नवसु नखित्र धुरि।
प्रगटि ऊंच ग्रह पंच, राग उच्छाह निरंत्रा।
जनमे भरथ केकई, सत्रघण लखण सुमित्रा।
बजि थाळ सकळ वाजिंत्र वजे, कुसम सघण सुरियंद किया।
वेखियां हीज आवै वणै, उण दिन तणी अजोधिया॥