मानव किसा जगि मझि जिके जगदीस जांणै।

किसा तिके गुणवंत जिके वप आप वखांणै।

किसा तिके दे दातार जिके नर घृणा अपै।

किसा तिके धर्मवंत जिके नारायण थपै।

कहि हूत किसी वाटे नहि, सकजि किसो गजण सहै।

उदो किसो उदैराज कहै, जिण अधारो आगै रहै॥

स्रोत
  • पोथी : उदैराज बावनी (परंपरा भाग- 81) ,
  • सिरजक : उदैराज ,
  • संपादक : नारायण सिंह भाटी ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी,जोधपुर।
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