घरी घरी नृप गेहि, एह घड़ियालउ बज्जै।
कहै पुकारि पुकारि, आउ खिणहि खिण छीज्जै।
संपति सांस सरीर, सदा नर नाही निसचल।
पुरइणि पत्र पतत बूंद, जळ लव जिमि चंचल।
इमि जानि जगत जातौ, सकल चित चेतौ रे मूढ नर।
ऊवरै जु तौ छीहल कहइ, दीजिइ दाहिण उच्चकर॥