तब महिमा कर जोरि हुरम कूँ सीस नवायौ।

चढ्यौ अस्व की पिट्ठि दैव पहुँचाव सुभायौ॥

कहै हुरम सुन सेख देह कंपत है मोरी।

छिनक बैठि यहिं ठौर सरन मैं लीनी तोरी॥

कहै सेख यह बात नहिं, तुम साहिब मैं दास तुव।

यह धरम नाहिं उलटी कहो, सरन सदा सेवक सुभुव॥

स्रोत
  • पोथी : हम्मीर रासो ,
  • सिरजक : जोधराज ,
  • संपादक : श्यामसुंदर दास ,
  • प्रकाशक : नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ,
  • संस्करण : तृतीय
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