निरमल चित्त पवित्त, सदा अच्छै उत्तम मति।
जो उह बसइ कुठांई, तासु नहिं भिदै कुसंगति।
तिंह समीपि सठ बहुत, मिलिब जौ करइ कुलच्छण।
सुभ सुभाव आपणौ, तऊ मुक्कइ न विचच्छण।
श्रीखंड संग जिम रयणि दिन, अहि असंखि बेठ्यौ रहै।
तद्वपि सुबास सीतल मलय, विष न होय छीहल कहै॥