निरमल चित्त पवित्त, सदा अच्छै उत्तम मति।

जो उह बसइ कुठांई, तासु नहिं भिदै कुसंगति।

तिंह समीपि सठ बहुत, मिलिब जौ करइ कुलच्छण।

सुभ सुभाव आपणौ, तऊ मुक्कइ विचच्छण।

श्रीखंड संग जिम रयणि दिन, अहि असंखि बेठ्यौ रहै।

तद्वपि सुबास सीतल मलय, विष होय छीहल कहै॥

स्रोत
  • पोथी : कविवर बूचराज और उनके समकालीन कवि ,
  • सिरजक : छीहल ,
  • संपादक : डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल ,
  • प्रकाशक : श्री महावीर ग्रंथ अकादमी, जयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै