आर्या

मद मदिरा रस मत्ती, स्त्ती आपांण अंग अहरती,
करत विलास सकत्ती, चाळ राय मंढ चाळकना॥

छप्पय

बन समाज अति विपुल, सदा ऋतु राज छरितु सुख।
लता गुल्म तरू तरल, माल मिलि मुखर सिली मुख॥
सुरभि धनष गव ससक, सूर चीता पँचाणण।
एण विवध मृग रवण, भवण भावण भिल्ली गण॥
निश्वार निकुर निर्दलणियत, ते आधो फल बेत तल।
चाल्ळक राय अद्भुत रमै, थटि नाटिक मन रंग थल॥

कमल अमल अलि कलिन, अगर कुंकम सु श्रँवतै।
गँध सार मृग सार, अगर घण सार अनंतै॥
केतकि केवड़े कुँद, कँज कमनिय कुस्मा कर।
तत्र तापहर तिंमिर, छत्र महि ताप छिपाकर॥
आवत सुगँध कमरँद यल, फटिक बँध उज्जवल फरस।
जर दोज आस भण खाए जहि, रमण रास अम्बा सरस॥

चक धरण धर चाप आप धाता फरसा धर।
सकंदन वर मिहर सोम कुल नव काकोदर॥
विद्याधर गंधर्व सिद्ध चारण किंन्नर सह।
जखि अच्छर रिषराज, वीर खेला बावन्नह॥
नवनाथ अंसधारी निखिल, भैरवादि कौतिक भमर।
तेतीस कौटि प्रमुदा सहित आनंदित आये अमर॥

सुरज विपंचिक उमरू, तुरज भेरी दर तुरण।
सुर दुँदभि सहनाय, पणव गोमुख पर पूरण।
श्री मंडल सहतार, संख झालरि झणणाटा।
धणणाटा घूघरा, ठणिक तालिन ठण णाटा॥
सँभूत थारत त्वजदार सह, आसिह सत पद जूजुवा।
षट तीस भेद बाजित करषि, हरषि देव हाजिर हुआ॥

मजंनादि षोडस मनोज्ञ, श्रृंगार सुसज्जिय।
काय पलट परमा प्रकाश, अदभुत उपज्जिय॥
रुक तार सुकमार, हार माणिक मोत्ताहल।
रचि दुकूल नवरंग परम गेतूल मरम्मल।
कर चरन लंक भूषण करण, धूनल ध्राण समध्धरै।
कौतिक सुतंत्र कीड़ा करण, आदि शकत्ती उत्तरै॥

लांगा बावनलार, झूल चौसठ उर झल्लिय।
हड़ हड़ हड़ हँसि होड़, खखड़ खेतल खिल खिल्लय॥
भणण णणण रव भेरि, तंत्रिनद तण णणणणणण॥
धू धर धुरि धण णणण, झांझि स्वर झण णणणणणण ॥
मन मगन त्रदस अतिमिष मुदित, आँणद उदधि उलट्टियो।
अद्भुत खेल नाटक अमल थल मन रँग सिर थप्पियो॥

धम धम धम धम धरणि, धरणि धर धाम धमक्किय॥
चभेक्किय त्रिहुँ भवण बिधू नभ गवण विथक्किय।
वलि अंगद त्राटंक, हार मँजीर मनोहर।
भल लललललल भलकि, अँग आभूषण अम्बर॥
बँधाण राग पे गति विविधि, मदि मृदंग धुनि माधुरी।
अद्भुत विलास आदो फरे, रचत रास नाटेश्वरी॥

धुधुकट धूधुकट ध्रकिट, ध्रकिट धुनि ध्रकिट ध्रकिट धप।
थागड़ गड़दा थागड़ गड़दा थेई थेई थेई थप॥
लगत दाट चल बलथ, बलथ बक उरूप तिरप अति॥
स्वल पयार ठेका सुचँग, ईग्यारह साँगीत गति।
मुरछना ताल स्वर ग्राम, मिलि धाम तान बंधु धरत॥
सुमनस विलोकि नाटिक सुसम, कुसम थाट बरपा करत्त॥

उलट पलट फरँगट अछेह, प्यँड लपट झपट पट।
उरज उचक कच लचक अंघि तल मचक अवनितट॥
ग्रीव हलत चख संग, अंग, रसरँग उपट्ठत।
चछड़ छड़ छड़ ध्रुव छछड़, थ्रँग थ्रँगइ ध्वनि थट्ठत।
अलाद मगन हुय गण अमर, बप अप संज्ञा बीसरी।
चतुरासि हरषि हरि हर हँसत, रचत रास लखि ईशरी॥

भँजनि सुम्भ निसुम्भ, चडं मुंड खँडनि चंडिह।
रक्त बीज निर दलनि, महषि भख करनि उमडिय॥
बडाँ बडी बदि बाक डाक आडम्बर डोलत।
जय जय जय जय जयति वृँद वृँदारक बोलत॥
अम्बिका आदि भूता अखिल, कादि कीक लगि कारणी।
नह पड़ै सूझ आगम निगम तूझ चरित भवतारणी॥

विधि स्वरूप जग बिविध रचत तूं हिज सुरराया।
विष्णू रूप तू बणैं, मंड पालत महमाया॥
तू कर धरै त्रिशूल, रूद्र रूपा सँहारत।
तू उत्पत्ति तू सथित तूं हिज लइ अवरन कोतत॥
सच्चिदानंद रूपा शकत्ति, तू अनेक गति बिस्तरी।
जगदम्बि एक तूही जननि, सँतति बाला सुन्दरी॥

तरणि जलज रजि रूचिर, भजत अज सरजि अरज भव।
सरब काल इच्छित सहस्र मष्तक धर माधव॥
गंग धरन कत सँग परम भसभंग विलेपन॥
खँजल महि हरि सिखियतै, तत बरतत त्रिगुणातम तन॥
अव्यय अनंत अन वद्य इक, अग जग व्यापक सर्वमय।
कह कृपाराम कारण करण, जय जय जय जगदम्बि जय॥
स्रोत
  • पोथी : माताजी रा छंद ,
  • सिरजक : कृपाराम खिड़िया ,
  • संपादक : चन्द्र प्रकाश देवल ,
  • प्रकाशक : चारण साहित्य शोध संस्थान प्रकाशन, अजमेर ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
जुड़्योड़ा विसै