झीण लंक पदमिणी, सेजि नहीं रमी सुरति रस।

अरियण असिवर धार, त्रास कीन्हैं न अप्प बस।

सुज्जस कज्ज संसार, दब्ब दीनौ न सुपत्तह।

बोरे अपणइ चहत, चाव पिख्खियौ न चित्तह।

कर्‌यौ न सुकृत के करम मन, कलि अवतरि छीहल्ल भनि।

उद्यान मज्झि जिमि मालती, तिमि नर जनम अकियथि गिनि॥

स्रोत
  • पोथी : कविवर बूचराज और उनके समकालीन कवि ,
  • सिरजक : छीहल ,
  • संपादक : डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल ,
  • प्रकाशक : श्री महावीर ग्रंथ अकादमी, जयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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