झीण लंक पदमिणी, सेजि नहीं रमी सुरति रस।
अरियण असिवर धार, त्रास कीन्हैं न अप्प बस।
सुज्जस कज्ज संसार, दब्ब दीनौ न सुपत्तह।
बोरे अपणइ चहत, चाव पिख्खियौ न चित्तह।
कर्यौ न सुकृत के करम मन, कलि अवतरि छीहल्ल भनि।
उद्यान मज्झि जिमि मालती, तिमि नर जनम अकियथि गिनि॥