हूं पतीजउं गोरी थारइ वइणि।

जां नवि देखउं आपणइ नइणि।

काल्ह ही उलगाणउ हुइ गम करउं।

तेंड़ू बंभण दिन गिणउ आज।

छोडउं देस सवालखउ।

गोरी कोकि भतीजा म्हे सउंपिस्यउं राज॥

स्रोत
  • पोथी : बीसलदेव रास ,
  • सिरजक : नरपति नाल्ह ,
  • संपादक : डॉ. माता प्रसाद गुप्त, अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : हिन्दी परिषद प्रकाशन, इलाहाबाद ,
  • संस्करण : द्वितीय
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