चालियउ उलगाणउ धण जाण न देइ।
मो नइ मारि कइ सारिसीय लेइ।
अंचल ग्रहि धण इम कहइ।
दुइ दुख सालइ हो सामीय सांझ।
जीवन मुरड़ीय मारिस्यइ।
दोस किसउ जइ साधण बांझ॥