अध नारी सज सांग अखाड़ै,

आच खपर ले खाग उघाड़ै।

बाजोइ डमरू डाक बजाड़ै,

जोगणि सूतोई नाग जगाड़ै॥

साथ झूलर ले सगत सहेली,

न्रत घूमर दे रूप नहेली।

अतर फूलेल कियां अलबेली,

तीन लोग ऊपर छबि तेली॥

कानां हंस बिराजै कुंडळ,

अन्दइ रूप दिपै चंद ऊजळ।

बणि पौसाक जरीकस बद्दळ,

जां बिच गात भळक्कै बीजळ॥

चंगां चीर धरियां धूपर,

अखन कंवारी बाळाइ सुंदर।

रमत मात मन रंगथळ ऊपर,

सूंधा सिखर अळंग अधप्फर॥

खड़ग खप्पर हत्थ लियां मुख बीढज उप्पर रत चखियां

धड़क धप्पर रत्त पियां सुख ईढज सुरनर सत्थ लियां

खण वाहण बब्बर साथै ही संकर नक्कर नर सुर नाग नमैं

बणि जवांन घड़ी खिण बुढ्ढिय बाळक रांमत चाळक नेच रमैं

देवी रांमत चाळक नेच रमैं॥

चटकी दे जाळी फिरत ऊंताळी रमत कमाळी सुर राया

कंडळ किरणाळी दीप दिवाळी मंगळ जाळी मंहमाया

चाळक चिरताळी मद मतवाळी धरणि पियाळी गाढ़ धमैं

बणि जवांन घड़ी खिण बुढ्ढिय बाळक रांमत चाळक नेच रमैं

देवी रांमत चाळक नेच रमैं॥

तिलड़ी लड़ लटकत तड़का तटकत भोजन गूंद गिळा

पीवत मद मटकत प्याला पटकल थटकत निज मन रंग थळा

नाचत न्रत नटकत अलकां छिटकत भैचर अटकत वास भमैं

बणि जवांन घड़ी खिण बुढ्ढिय बाळक रांमत चाळक नेच रमैं

देवी रांमत चाळक नेच रमैं॥

तन तेज झळक्कै बीच भळक्कै हार हळक्कै हीर हियै

गळ हांस ठळक्कै मग्ग पळक्कै मधुर मुळक्कै हास कियै

ठम चाल टळक्कै वैण लळक्कै सेस सळक्कै जेण समैं

बणि जवांन घड़ी खिण बुढ्ढिय बाळक रांमत चाळक नेच रमैं

देवी रांमत चाळक नेच रमैं॥

घूघर घणघण गाजै गणणंण अंबर सणणण मिरदंग भणकै

खंजर खणखण झींझा झणणण नेवर ठणणण डमरू ढणकै

फोरौ फणणण घूमर घणणण जेवर जणणण चुड़ौय चमैं

बणि जवांन घड़ी खिण बुढ्ढिय बाळक रांमत चाळक नेच रमैं

देवी रांमत चाळक नेच रमैं॥

गूंथे यों गजरा ओपैई अजरा रंग सो सजरा हाथ रखै

खिम लोयण खिजरा फाटहि फजरां ईसर मुजरा जाय अखै

ले घूंघट लजरा ग्यान सो गुजरा जाणत तुजरा खेल तमै

बणि जवांन घड़ी खिण बुढ्ढिय बाळक रांमत चाळक नेच रमैं

देवी रांमत चाळक नेच रमैं॥

थिर गिर थंडी रच नव खंडी दांणव दंडी गणयार रसा

सिस भांण मंडी पिंड प्रचंडी उमंग उदंडी रूप इसा

चिरतां धन चंडी बप्प ब्रह्मांडी जगत अखंडी जाय रमैं

बणि जवांन घड़ी खिण बुढ्ढिय बाळक रांमत चाळक नेच रमैं

देवी रांमत चाळक नेच रमैं॥

रामंत चाळक नेच, जका गति लखी जावै।

इन्द्र करत आदेस, परम गति लखी पावै॥

सेस निंवावत सीस, धिनो न्रत तूझ सगत्ती।

आई आद अनाद, पुरस पुराण प्रकत्ती॥

सुर असुर पार पावैं नहीं, आप बड़ा छौ ईसरी।

चाळक देवी चरत चवै जयो मात जोगेसरी॥

स्रोत
  • पोथी : राजस्थानी शक्ति काव्य ,
  • सिरजक : किरपाराम खिड़िया ,
  • संपादक : भंवरसिंह सामौर ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : द्वितीय
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