दीन्ही सोपारीयउ नइ हरखिय राय।

मनिहि आणंदियउ अधिक उछाह।

घरि घरि गूड़ी ऊछलइ।

कामणि गावइ छइ मंगलच्यार।

चहुआंणां कुल ऊधरउ।

जइ घरि आविस्यइ जाति पमारि॥

स्रोत
  • पोथी : बीसलदेव रास ,
  • सिरजक : नरपति नाल्ह ,
  • संपादक : डॉ. माता प्रसाद गुप्त, अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : हिन्दी परिषद प्रकाशन, इलाहाबाद ,
  • संस्करण : द्वितीय
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