लखमण नउ अंग फरसीयो, हाथ विसल्या लायोजी।
सकति हीया थी नीसरी, अगनि मुंकती जायोजी॥
मुंकति जायइ अगनि झाळा, हनुमंतइ काठी ग्रही।
कामिनी रूपइ कहइ सुणि तुं, दोस माहरउ को नहीं॥
तुं मुंझि मुझ नइ वात सांभळि, मइं सहु को संतापीयो।
हुं सकति रूप अमोघ विजया, लखमणनो अंग फरसियो॥