दूहा
पींपासर प्रगट्यो प्रभु, पहुमी काटण पाप।
जगत अहर-निस जापियो, जंभेसर रो जाप॥
जयो जंभेसर नाथ जग, विदगां बुद्ध वरीस।
पवित जात पंवार में, जोड़ै तूं जगदीश॥
छंद रैंणकी
परमारां कोम भोम पींपासर, काट पाप निकळंक करी।
घणनांमी रीझ आय लोहट घर, धर उण पावन देह धरी।
हंसा री गोद रम्यो कर हर-हर, भू तर-तर विसवास भयो।
जगदीसर रूप नमो जग जाहर, जंभेसर गुरु नाम जयो॥
जिये, जंभेसर महाराज जयो॥
बैठो वन जाय वरस बारा लग, तन तावड़ियै ताप दियो।
सुरभ्यां री सेव देव तैं साजी, काज बडो अणभेव कियो।
मन में हद प्रेम नेम सूं मालक, राजी हुय रखवाळ रयो।
जगदीसर रूप नमो जग जाहर, जंभेसर गुरु नाम जयो॥
जिये, जंभेसर महाराज जयो॥
जोगी धर जोग मून वा झाली, काली दुनिया खिखर करै।
गुण री नहीं समझ गूंगियो गूंगा, धर संसारी नाम धरै।
उण पुळ हे अळख! पलक में अवनी, काट द्वंद परकास कियो।
जगदीसर रूप नमो जग जाहर, जंभेसर गुरु नाम जयो॥
जिये, जंभेसर महाराज जयो॥
समरथ तूं जाप जप्यो समराथळ, थळवट धर पग पवित थही।
वाणी हद तोर विमळ वरदायक, बेख ग्यान गंग धार बही।
निरमळ नर नार हुया कर नावण, छावण तैं कर छत्र छयो।
जगदीसर रूप नमो जग जाहर, जंभेसर गुरु नाम जयो॥
जिये, जंभेसर महाराज जयो॥
भू पर धहकाळ कराळ भयंकर, पाप प्रळयंकर यूं पसरै।
मचगी हहकार हकार मही पर, नाज सरण तज घर निसरै।
विसरै सुद्ध बुद्ध मावड़ी बाळक, भिळी भिगळ चळ-विचळ भयो।
जगदीसर रूप नमो जग जाहर, जंभेसर गुरु नाम जयो॥
जिये, जंभेसर महाराज जयो॥
समराथळ थान नाथरै सरणै, ढूक मऊ बड ओट ढबी।
पायो अन्न पेट राबड़ी पूरण, साम नेह सूं नाथ सभी।
दीनो उपदेस जदै दुख दाटण, कीरत खाटण काम कियो।
जगदीसर रूप नमो जग जाहर, जंभेसर गुरु नाम जयो॥
जिये, जंभेसर महाराज जयो॥
नित प्रत नेम बीस नव निरमळ, दया कीध हरि आप दिया।
पाळै घट राख साख आ परगळ, हिव विश्नोई नाम हुया।
गूंजी जयकार गणण गयणाकर, हणण भीड़ जद भीर हुयो।
जगदीसर रूप नमो जग जाहर, जंभेसर गुरु नाम जयो॥
जिये, जंभेसर महाराज जयो॥
जय-जय गुरुदेव जगत रा तारण, अघ जारण मुझ ओट अपै।
चारण धर ध्यान चाव सूं चवड़ै, जस गिरधर कवियांण जपै
प्रभता नीं पार आपरी पामू, दया निद्ध बुद्ध रीझ दयो।
जगदीसर रूप नमो जग जाहर, जंभेसर गुरु नाम जयो॥
जिये, जंभेसर महाराज जयो॥
कवित्त
जयो जंभेसरनाथ, प्रीत परकत सूं पाळी।
जयो जंभेसरनाथ, भीर अबळां री भाळी।
जयो जंभेसरनाथ, साच उपदेस सुणाया।
जयो जंभेसरनाथ, वसु विश्नोई बणाया।
जंभेसर काम जाहर जगत, जगदीसर रै जोड़ रा
कीरती गीध कवियण करै, काटण अघ तूं कोड़ रा॥