मइं छंडी हो स्वामी थारी आस।

जोगिणि होइ सेवउं बनबास।

कइ तउ परबत चडउं केदार।

कइ रें हिमालइ माहिं गिलउं।

कइ तउ झंपद्यउं गग दुवारि॥

स्रोत
  • पोथी : बीसलदेव रास ,
  • सिरजक : नरपति नाल्ह ,
  • संपादक : डॉ. माता प्रसाद गुप्त, अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : हिन्दी परिषद प्रकाशन, इलाहाबाद ,
  • संस्करण : द्वितीय
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