ऊलग जाण कहइ धणी कउण।

घर माहे वरउ नहीं कूल्हडइ लूण।

घरि अकुलीणीय रे कलि करइ।

रिण का चंपिया घर सुहाइ।

कह रे जोगी हुइ नीसरइ।

कह मुहड़उ लेइ नइ ऊलग जाइ॥

स्रोत
  • पोथी : बीसलदेव रास ,
  • सिरजक : नरपति नाल्ह ,
  • संपादक : डॉ. माता प्रसाद गुप्त, अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : हिन्दी परिषद प्रकाशन, इलाहाबाद ,
  • संस्करण : द्वितीय
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