रामंत सगत अतरूप, ओपै सिणगार अनेकूं

अजर समर आखाड़, माढधर चाढ विमेकूं

जास वीर जोगंद, खेले गण गंध्रव खेळा

मादळ भेर म्रदंग संख मेळ समेळा

पार अपार प्रमांण परमगत मय परमेसरी

विभू रूप वैराट अड़सठ तीरथ ईसरी॥

निरत करत नवनाथ, हाथ ज्वाळा हुतासण

सिध चौरासी साथ, साथ सिखर मुगटाभंण

कुंडंळ झळ हळ कांन, दंतउज्जवळ दाड़ाम्मी

भैरव हाक भयंकर, डाक आप डंम डंमी

नव लाख नाम नमण करे, पारवती तोरे पवां

आवड़ा आद सगती अघट, चरित सह किस विध चवां॥

काटे गळो कोय, छो धोरी धर छड्डै

होवे धेनु अव्या, बोनांखी बड्डै

पेटां जणे पनंग, साता सगत पाळेवो

धरती कालर धार, वां इन्द्र वरसेवो

सांवळी सुरत सुप्रसण होवो, क्यूं मंडप आवेळो

माडेचीमा कीजै मेहर, रै गुनै तोई रावळो॥

गैण किया गंणणाट, धर हर क्यों धूंज्यो

मंदर बजरयां मांय, गिरवर क्यों गूंज्यो

काळो कूकर क्यों, क्यों जोगी जटा धारी

वणीया बाळे भेस, वंणै बूढो बाजारी

कत्तीयांण क्यों कात्या करग, केसविखर लट काळियां

सगती मेहोतो सरणै, त्रासे नहीं इण ताळियां॥

आद अनाद सगत अघटा, घट घट घाट घड़ण सुघटा

पालट घट आयो प्रगटा, आई उपावण नाम उभटा

घर मांमड़ अवतरी गंगा, सपतामत भ्रात के संगा

परबत त्रेमड़ैराय परंगा, रमती रास रास जुग रंगा॥

स्रोत
  • पोथी : राजस्थानी शक्ति काव्य ,
  • सिरजक : मेहा बीठू ,
  • संपादक : डॉ. भंवरसिंह सामौर ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : द्वितीय
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