माढ़राय मंडाण, करण कोळाहळ सकते।

प्रथ्वी सरग पंयाळ, नाग नरसुर निमते॥

वांण खांण विध विध, ओपत खपत सुर असुर।

भांजण घड़ंण भोगवण सहे, विद्या मायासुर॥

आई अवतार अगोचरी, पालट घट अप्रम्परा।

प्रणमे ‘मेहो’ परमेस्वरी, अधक चरित ऊंडेचरा॥

माढराय मंडाण, आद सगत तूं अम्बा।

माढराय मंडाण, तूं तारक जगदम्बा॥

माढराय मंडाण, आप त्रहूं लोक उपाया।

माढराय मंडाण, खांत कर दांणव खाया॥

लोकपाळ त्रहूं लोचणी, सुरनर मुनीवर सम्मरी।

‘मेहै बीठू’ पर की महर, ज्यों सुक देव पर साकम्भरी॥

माढराय मंडाण, आवड़ कीयो अवचळ।

माढराय मंडाण, नगरी चाळकनू नहचळ॥

माढराय मंडाण, भाटी कर भूपळा।

माढराय मंडाण, पालीवाळां पोसाळा॥

गळ बंधण छूटा गऊवां, मऊवां पोखाणी मिलै।

खळ मार इळ अड़संजा री, कर ओरण मेटी कळै॥

माढराय मंडाण, कोट तणोट करीजै।

माढराय मंडाण, वींझणौट बणीजै॥

माढराय मंडाण, दुगम देराव लुद्रवै।

माढराय मंडाण, काळै डूंगर नै कोलरवै॥

देग झुवरखो भादरियो, अनड़ त्रेमड़े उपर्‌या।

‘मेहै बीठू’ पर मातेसरी, किवळासणी मेहर कर्‌या॥

माढराय मंडाण, रांम कुण्डां रांमगढ़।

माढराय मंडाण, गढ़ गुरेरै भांणगढ़॥

माढराय मंडाण, देवीकोट मां आस देवी।

माढराय मंडाण, किसनगढ़ गंजे केवी॥

भूरे डूंगर न्रिभरे घंटियाळ वीर घंटा घुरै।

मढ त्रेमड़ै मांय आरती ‘मेहो बीठू’ उच्चरै॥

माढराय मंडाण, देवळ माही देवळियां।

माढराय मंडाण, पीळै रंग री पूतळियां॥

माढराय मंडाण, पूतळियां मांहि प्रगट्टै।

माढराय मंडाण, सज सिंणगार सुघट्टै॥

लल्लकार रम्मण लगी, थान त्रेमड़ौ थरथर्‌यो।

मंदर मांय कहै ‘मेहो’, नरसींह थम्म मांय नीसर्‌यो॥

स्रोत
  • पोथी : राजस्थानी शक्ति काव्य ,
  • सिरजक : मेहा बीठू ,
  • संपादक : डॉ. भंवरसिंह सामौर ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : द्वितीय
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