इतै खुरम आवियौ, साह परि सझि दळ सब्बळ।

धर साहां धौपटै, खलक मंडि पड़े खळव्भळ।

तांम साह तेड़ियौ, ‘गजण’ जीपण गजभारां।

अवस को (इ) ऊबरां, तेड़ि लीधा तिण वारां।

करि ‘गजण’ थाट खटतीस कुळ, आरावा गज धज अगां।

हालियौ साह संकट हरण, खुरम साह भांजण खगां॥

स्रोत
  • पोथी : सूरजप्रकास भाग 2 ,
  • सिरजक : करणीदान कविया ,
  • संपादक : सीताराम लालस ,
  • प्रकाशक : राजस्थान राज्य प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै