चालियउ उलगाणउ धण जाण देइ।

मो नइ मारि कइ सारिसीय लेइ।

अंचल ग्रहि धण इम कहइ।

दुइ दुख सालइ हो सामीय सांझ।

जीवन मुरड़ीय मारिस्यइ।

दोस किसउ जइ साधण बांझ॥

स्रोत
  • पोथी : बीसलदेव रास ,
  • सिरजक : नरपति नाल्ह ,
  • संपादक : डॉ. माता प्रसाद गुप्त, अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : हिन्दी परिषद प्रकाशन, इलाहाबाद ,
  • संस्करण : द्वितीय
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