बोलइ छइ भावज छंडीय काणि।
अंचल ग्राहि गइसारिय आणि।
ऊभी दीयइ उलंभड़ा।
कइ धण थारइ हीयइ न समाइ।
कइ धण जीभकी आकरी।
किणि दुख देवर ऊलग जाइ॥
स्रोत
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पोथी : बीसलदेव रास
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सिरजक : नरपति नाल्ह
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संपादक : डॉ. माता प्रसाद गुप्त, अगरचंद नाहटा
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प्रकाशक : हिन्दी परिषद प्रकाशन, इलाहाबाद
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- संस्करण : द्वितीय