मधुणिभ दंत जाकै जंघन बराह सम,

चाप सम बंस मद सुरभि हरित व्है।

रक्त मुख ओठ तालु नैन मधु पिंगल व्है,

सुंडादंड वृत्त मृदु लोम आवरित व्है।

वृत्त पीन कंधरा पयोद सम गाज जाकी,

सप्त कर ऊंचो मत्त पावन चरित व्है।

नखर अठारह बावीस अैसो जा नृप कै,

भद्र गज होइ तासों दुर्जन दरित व्है॥

स्रोत
  • पोथी : बलवद विलास ,
  • सिरजक : सूर्यमल्ल मीसण ,
  • संपादक : सौभाग्यसिंह शेखावत ,
  • प्रकाशक : राजस्थान साहित्य अकादमी (संगम), उदयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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