सेल जड़ै स्रीहथां, ‘जसौ’ पाड़ै जरदैतां।

बगल भरै महबूब, पमंग पाड़ै पखरैतां।

जुध खग वाहै ‘जसौ’, घणा मुगलां खळ घावै।

मसत गजां महबूब, धमक उर टक्कर धावै।

इम करी उरड़ असवारि असि, घण निबाब खळ घाविया।

तिण वार कमंध ‘सूरज’ तणा, सूरज हाथ सराहिया॥

स्रोत
  • पोथी : सूरजप्रकास भाग 2 ,
  • सिरजक : करणीदान कविया ,
  • संपादक : सीताराम लालस ,
  • प्रकाशक : राजस्थान राज्य प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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