घनाक्षरी छंद

बिरखा री रुत आई पीव रो संदेसो ल्याई
पिया सूं मिलण तांईं मन ललचावै है।

ठंडी पून मेघ गाजै हिवड़ै रा तार बाजै
हरी-भरी कूंपळ सूं जग मुळकावै है।

प्रीत परवाण चढ़ हियै रा आखर पढ़
सातूं-सुर रळमिळ रागणी सुणावै है।

अन्तस बण्यो है मोर चालै है सावण लोर
सूखी धरती रो कण-कण सरसावै है॥

स्रोत
  • पोथी : कवि रै हाथां चुणियोड़ी
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