इंद्रजित लखमण सुं अड़्यो जीहो, कुंभकरण करइं राम सुं जुद्धके।
सीह अड़्यो साम्हो नीलसुं जीहो, नल सुं अड़्यो दुरमद अति क्रुद्धके॥