परवत ऊपर अती उतंग।
दूषण लाग न कदे दुरंग॥
घणी सिझाई साथ अभंग।
गंभीरी गिर पासें गंग॥
भावार्थ :- पर्वत के ऊपर यह किला बहुत ऊँचा बना हुआ है, अतः शत्रु इस दुर्ग तक कभी नहीं पहुँच सकता। इस अपराजेय दुर्ग में सैनिक तैयारी (सज्जा) भी बहुत अधिक रही है। पर्वत के समीप ही गंगा के समान पवित्र गंभीरी नदी प्रवाहित हो रही है।