माखण मुखमल परि सुकमाल, कंचण वरण सरीसा गाल।

गुरु प्रिय वयण वयण सुसार, अमृत पूरण करण उदार॥

स्रोत
  • पोथी : सदयवत्स सावलिंगा चउपई ,
  • सिरजक : कवि केशव 'कीर्तिवर्धन' ,
  • संपादक : डॉ. मंजुलाल मजमुदार ,
  • प्रकाशक : सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर ,
  • संस्करण : प्रथम
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