गोखें गोरी काढ्यां गात।

सो शशि योगा सारद राति॥

चपळा कदळि सिषर चमकती।

मृग-नयणी चोघें मुळकती॥

भावार्थ :- गवाक्षों से बाहर दिखाई देने वाली स्त्रियों के गौरवर्ण शरीरांग शरद-पूर्णिमा की रात में प्रकाशमान चंद्रमा के समान दिखते हैं। वे मृगनयनी महिलाएँ जब मंद-स्मित के साथ देखती हैं, तो ऐसी दिखाई देती हैं, मानो पर्वत-शृंगों पर झिलमिलाती स्वर्णाभ विद्युत्-धाराएँ हों।

स्रोत
  • पोथी : खुमाण रासौं (खुमाण रासौं) ,
  • सिरजक : दलपत विजय ,
  • प्रकाशक : ब्रज मोहन जावलिया
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