दीसें ऊंचा बहु देहरा,

जाणें कि गिर बांध्या सेवरा।

दंड कलश धुज लहकें सदा,

वीर-घंट लहकंती मुदा॥

अति-उतुंग देवालय ऐसे दिखाई देते हैं, मानों पर्वतों ने सेहरे(मुकुट) धारण कर रखे हों। इन देवालयों के शीर्षभाग(कलश) पर स्थित ध्वजदंडों पर सदैव ध्वजाएं फहराती रहती हैं और बड़े-बड़े घंटे हर्ष के साथ झूलते रहते है।

स्रोत
  • पोथी : खुमाण रासौं (खुमाण रासौं) ,
  • सिरजक : दलपत विजय ,
  • प्रकाशक : ब्रज मोहन जावलिया
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