वावि कूप नें कुंड तळाव।

उदक तणो हुवै अणराव॥

घृत कण सुं भरियो कोठार।

भरिया धन अंबर भंडार॥

भावार्थ :- दुर्ग में कुएँ, बावड़ियों, कुंडों और तालाबों के आधिक्य के कारण पानी का अभाव कभी नहीं रहता। यहाँ के कोठार (भंडार) अन्न और घृत आदि पदार्थों से भरे-पूरे हैं, तथा भंडारों में प्रभूत मात्रा में धन-संपत्ति और वस्त्रादिक भरे हुए हैं।

स्रोत
  • पोथी : खुमाण रासौं (खुमाण रासौं) ,
  • सिरजक : दलपत विजय ,
  • संपादक : ब्रज मोहन जावलिया
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