जके रूप सौं साह बंध्यौ सुजाँनं।

जथा चंद्र की कांति चक्कोर माँनं॥

जथा पंकजं वै दुरैफैं लुभाए।

तथा साह बंध्यौ सनेहं सुभाए॥

स्रोत
  • पोथी : हम्मीर रासो ,
  • सिरजक : जोधराज ,
  • संपादक : श्यामसुंदर दास ,
  • प्रकाशक : नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ,
  • संस्करण : तृतीय
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