सुगनशास्त्र सूचनावां री शास्त्र है, जिणरै माध्यम सूं मिनख नै हुवण वाळी घटनावां रौ सै'ज संकेत पैली ई मिल जावै। भविस नै जाणण री जिज्ञासा वैदिक काळ सूं ले’र आज दिन तांई मिनख रै मन में कायम है। पशु-पक्षियां री भांत-भांत री चेष्टावां माथै आधारित सुगनां रौ भूविज्ञान सूं घणौ नेड़ौ रिस्तौ है। उदाहरण सरूप भूकंप रै चौबीस घंटां पैली सांप असांयत अर डरूं-फरूं हुय’र बिलां सूं बारै आ जावै। सूअर आपस में पागलां री तरै लड़ण अर काटण दौड़ै। कीं अैड़ी चिड़ियां अर माछळियां ई है, जिणां री चेष्टावां-खावण पीवण अर रैवण रा साधन बदळण सूं भूकंप, आंधी अर दुकाळ री सुचनावां तीन महीनां पैली ई मिल जावै। कीड़ियां आपरै बिलां सूं अंडा निकाळ’र ज्यूं ई किण ऊंचै सुरक्षित स्थान माथै ले जावण लागै, तो समझ लेवणौ चाइजै निस्चै ई कीं घंटां रै मांय बिरखा हुवण वाळी है। जे कीड़ियां धरती रै नीचला हिस्सां, किणी तळाब, झील या सगदर रै किनारां आपरा बिल बणा’र अंडा देवण लागै तो अेक महीनै तांई बिरखा हुवण री संभावना नीं रैवै। चीटियां नै बिरखा हुवण रौ पतौ मौसम-विज्ञान रै आर्द्रतामापी यंत्र सूं बौत पैली चाल जावै। इणी भांत सांप, सूअर, माछळियां, चिड़ियां इत्याद नै भूकंपमापी यंत्र री संभावनावां सूं बौत पैली ई भूकंप रौ पतौ निश्चित रूप पड़ जावै।

 

सुगनशास्त्र री व्यापकता

 

वेदां अर श्रुतियां में ज्योतिष सूं संबंधित कोई चार लाख श्लोक मिलै। पण आं चार लाख श्लोकां रौ अध्येता जे सुगनशास्त्र रै ज्ञान सूं अणजाण है तो उणरौ ज्ञान अधूरौ मान्यौ जावै।

‘बृहत्संहिता’ रा रचनाकार आचार्य वराहमिहिर सिद्धांत-संहिता अर होरा रै साथै-साथै सुगनोत्तर अध्याय रै नांव सूं न्यारै-न्यारै पशु-पक्षियां री चेष्टावां अर आवाजां स्वतंत्र रूप सूं इग्यारै अध्यायां री रचना कर’र सुगनशास्त्र नै ज्योतिष रै अभिन्न अंग रै रूप में दरसायौ है। हकीकत में जनश्रुतियां अर लोकविश्वास माथै आधारित सुगन-ज्ञान आपां रै बडेरां रै लगौलग कर्‌यौड़ै सूक्ष्म परीक्षण अर शोध रौ नतीजौ है, जिणनै फगत अंधविश्वास कैय’र नी नज़रअंदाज कर्‌यौ जा सकै। सुगन-ज्ञान व्यावहारिक विद्या रौ नांव है, जिणरै परिणाम रौ पतौ आपां नै हाथौहाथ चाल जावै। औ खोजपूरण, रहसभर्‌यौ, चाल मनोरंजक विज्ञान है। फगत पशु-पक्षिया चेष्टावां ई नीं, प्राकृतिक प्रकोप, उल्कापात, आकास रा लक्षण, इंदरधनुष, बिरखा, अंग फड़कणा, छींक अर रवानै हुवतां सामी आवण वाळी हरेक वस्तु सूं शुभ—अशुभ परिणामां पतौ लगावणौ सुगनशास्त्र रा विषय है।


माघ अर फोगसी

जनश्रुतियां में प्रचलित अेक किंवदती मुजब संस्कृत रा महाकवि माघ अेकर जंगळ में घूमण-फिरण री गरज सूं दूर निकळ पड़्या। कैवै क महाकवि माघ संस्कृत साहित्य रै अलावा ज्योतिषशास्त्र रा ई धुरंधर विद्वान हा अर उणां नै आपरी उण विद्या रौ कीं अहंकार ई हुयग्यौ हौ। दूर जंगळ में अेक निरजण स्थान में उणां री मुलाकात फोगसी नांव रै ग्वाळियै सूं हुई। कीं विद्वान ई ग्वाळियै नै भगवान शंकर रौ रूप मानै, क्यूं कर महाकवि माघ रौ पांडित्य जन-साधारण रै वास्तै समझणौ कठण हुयग्यौ हौ, सो उणनै जनवाणी में लोक चावौ बणावण रै वास्तै अर महाकवि माघ रै शास्त्रीय दंभ नै तोड़ण रै वास्तै साख्यात् शंकर नै प्रगट हुय’र समझावणौ पड़्यौ। वियां भगवान शंकर ई सुगन विद्या रा आदि प्रवर्तक बाजै। फोगसी ग्वाळियौ महाकवि माघ रौ आदर-सत्कार कर’र उणां नै ऊंचौ आसण दे’र ''बिरखा कद हवैला?'' इण बाबत अेक सवाल कर्‌यौ-

तिथि-पत्रा ले माघ ज आया
फोग सुआसन दे बैठाया
कहै फोगसी मेह कद होसी
सांचौ लगन बतावौ जोसी

महापंडित माघ तुरत गणना कर’र बतायौ क आज रवि-योग नी है; बिरखा रौ नखतर ई नी है, पंचांग में बिरखा रौ कोई उत्तम योग ई दीखी नीं रैयौ है, सो हाल कीं दिन बिरखा रा योग साफ-साफ दीख नीं रैया है।

माघ कहै सुण फोगसी
आज योग रवि नांय
संयोगौ मिल्यौ नहीं
देख्यौ पतरा मांय

महापंडित माघ रा वचन सण’र फोगसी बोल्या—

ग्वाळ कहै सुणौ माघजी
बिरखा होसी आज
भणिया पण गुणिया नहीं
गुण आवौ म्हाराज

फोगसी री बात सुण’र महापंडित माघ इचरज में पड़ग्या, अर मोळै स्वर में बोल्या—

माघ कहै सुण ग्वाळिया
गुण वो किण विध होय
सवालक्ख ज्योतिष पढ्यौ
कंठ पाठ है मोय

घन बरसै अेतै गुणां

इण बात माथै ग्वाळियौ फोगसी माघ नै समझावण लाग्यौ क फगत किताबी ज्ञान सूं भविसवाणी नी करी जा सकै। बिरखा रै वास्तै पशु-पक्षियां री चेष्टावां अर सुगनां नै जाण’र सही अर सटीक भविसवाणी करी जा सकै। इण बात माथै महापंडित माघ ग्वाळियै फोगसी नै आपरा गुरु बणाया। तद वो सुगनशास्त्र रौ मरम उणां नै नीचै लिख्यै पदां में समझायौ—

अधिक अमूझौ अंग, रंग रोळी किरकांठां
डाढी कंवळा केस, वळी कूंपळ व्है बांठां
बड़ां सुरंगी साख, आक को पलट हकाई
चंद्र कूंडियै चक्र, तेज तारां निसताई
ऊकीरै उठ गोबर गिल्यौ
भ्रमर पंख भणणण भणा
कूड़ा है पतरा माघजी
घन बरसै अेतै गुणा

“जे डील में अणूंतौ ई अमूझौ लखावै। किरकांटियां रंग बदळण लागै। दाढी रा केस नरम पड़ जावै। पेड़-पौधां में कूंपळां ऊपर कानी उठण लागै। बड़लां री साखां सुरंग दीखण लागै। आक रौ रंग पलटण लागै। चंदरमा रै चौफेर चक्र (जळेरी) निजर आवण लागै। तारां रौ तेज नी दीखै। परभात रा पोटौ गीलौ हुवण लागै। भंवरा पांखां फड़फड़ा’र लगौलग उडणा सरू करदै—तो निस्चै ई बिरखा हुसी। हे माघजी, अठै बापड़ौ पंचांग कांई करै!”

सांडां रोक्या द्वार, जंबु बोलै झड़वाया
आळस अंग अपार, नयण निंदरा अलुवाया
कीड़ा काढै इंड, पंख माख्यां भणकावै
बकै पपइया पीव, मोर मल्हार सुणावै
कूकड़ला अध निसि बांगदै
आभै बादळ छिणछिणा
कूड़ा है पतरा माघजी
घन बरसै अेतै गुणां

“सांड जे बार रोक देवै। सियाळ्या झिड़कता सा बोलै। आंगां में आळस-ई-आळस वापर जावै। नीद लेवण रौ दिल करै पण नीद नीं आवै। कीड़ियां आपरा इंडा बिलां में सूं काढ’र बारै ले आवै। भिण-भिण करती माख्यां भिणभिणावण लागै। पपैया लगै-लग ‘पिउ-पिउ’ री रट लगावै। मोर मीठी आवाज में बोलण लागै। मुरगा आधी रात रा बांग देवै। अर आभै में बादळिया छितर्‌योड़ा हुवै। तो निस्चै ई बिरखा हुसी। हे माघजी, अठै बापड़ौ पचांग कांई करै!”

बीमरिया भणकाय, बकै पिउ इमरत वाणी
नाडी तत्ता नीर, पिघळ आफू गुळ पाणी
स्वान उझरिव मुख स्वास, भ्रमर गोबर गुड़कावै
जळ-जंतु अकुळाय, गीत गोहां जुड़ जावै
बादळिया निसिवासी रहै
कुंड्या अरक जळहळझणा
कूड़ा है पतरा माघजी
घन बरसै अेतै गुणा

“नेना-नेना पांखां वाळा कीड़ा भिण-भिण करै। पपैया मीठा-मीठा बोलै। नाड्यां में पाणी कम हुय जावै। अमल अर गुळ पिघळण लागै। कुत्ता ऊंचौ मूंडौ कर’र सांसां लेवण लागै। भंवरा पोटै माथै मंडरावण लागै। जळ रा जीव आकळ-बाकळ हुवण लागै। पाणी में गोहां बोलण लागै। रात भर बादळा छायोड़ा रैवै। सूरज-उगाळी रै बगत सूरजकुंड (सूर्यचक्र) दीखै। तो निस्चै ई बिरखा हुसी। हे माघजी, अठै बापड़ौ पंचाग कांई करै!”

बरस्यां बिना न जाय

बिरखा रै सुगनां रै आं छंदां रै अलावा केई हा ई माघ नै संबोधित करतां फोगसी कैया है, नमूनां रै रूप में कीं अठै पेस है—

पवन थम्यौ ध्वज थिर भई
अंग पसीनौ आय
माखी चटकै माघजी
सांझ मेह बरसाय

“जे हवा चालती-चालती रुक जावै, फैरावती ध्वजा थिर हुय जावै, अंगां में परसीनौ ई परसीनौ आवै अर माख्यां चटकै, तो सिंझ्या तांई जरूर बिरखा आसी।”

गूंज करै गोडावणा
लड़ै सांप री मासी
अधिक अमूझौ माघजी
मेह तो चौकस आसी

“गोडावण पक्षी बोलण लागै, सांप री मासी (खास किसम रौ अेक कीड़ौ) लड़ण लागै, अर आड़ंग अणूंतौ ई लखावै तो मेह तो निस्चित रूप सूं आसी।”

पोतै आफू पिघळ्यौ
गुळ री हुयगी गार
कुहक मचाई डेडकां
आसी मेह अबार

“अमल अपणै आप पिघळण लागै, गुळ पिघळ’र गारौ हुवै ज्यूं हुवण लागै अर मींडका लगौलग शोर मचावण लागै, तो मेह तुरत-फुरत ई हुसी।”

उतरादी कांठळ बधै
उत्तर बहै समीर
घड़ी-पलक में माघजी
पहुमी पूरै नीर

“उत्तर दिसा में बादळ दिखाई देवै अर उत्तर दिसा री ई हवा हुवै, तो हे माघजी! घड़ी-पलक में ई धरती नीर सूं पूरीजसी।”

उतरादी कांठळ बधै
दिक्खण बाजै वाय
पण ऊफणता नीर ज्यूं
आई घटा उड़ाय

“उत्तर दिसा मे बादळां री घटा हुवै अर दिक्खण री हवा बैवै, तो घटा उड़ती-सी आ’र घणघोर बरसैला।”

उतरादी कांठळ बधै
पूरब बाजै वाय
नूंत्या जीमै पांवणा
बरस्यां बिना न जाय

“उत्तर दिसा में घटाटोप बादळा दिखाई देवै अर पूरब री हवा चालती हुवै तो बादळ बरस्यां बिना नी जावैला।”

वुद्ध हुवा मेह माघजी
(मेह रै बूढै हुवण रा लक्षण)

जद फोगसी मेह हुवण रा सगळा ई लक्षण बता दिया तो महाकवि माघ उणसूं मेह रै बूढै हुवण रा लक्षण ई पूछ्या, मतलब मेह रै खतम हुय जावण रा लक्षण पूछिया। तद ग्वाळियौ फोगसी महाकवि माघ नै बतावण लाग्यौ—

रवि ऊगंतौ स्याम
आथमतौ काळौ तवौ
माघा मेह न थाय
दिन दस पवन झकोळसी

“ऊगतौ सूरज कीं-कीं काळौ दिखाई देवै अर आथमतौ अेकदम तवै री तरै काळौ दिखाई देवै, तो हे माघजी! दस दिनां तांई हवा चालती रैवैला अर मेह नी आवैला।”

कुरज उड़ी कुरळाय
मकड़ी जाळा रोपिया
बूंद द्रवै नहिं आथ
वृद्ध हुवा मेह माघजी

“कुरजां आकळ-बाकळ हुय’र कुरळावण  लागै अर मकड़ियां खुली जगावां जाळा बणावण लागै, तो अेक बूंद ई नीं बरसैला। हे माघजी, मेह तो बूढौ परौ हुयौ!”

ओस जमै सिर घास
मोती-सा झळमळ करै
सीतळ पवन सुवास
वृद्ध हुवा मेह माघजी

“परभातां रा घास माथै ओस री बूंदां मोती-सी झळमळ-झळमळ करै अर ठंडी सुगंधित हवा बैवै, तो हे माघजी समझलौ मेह तो बूढौ हुयौ परौ।”

माखन ठरियौ माठ
छिण-छिण छायौ छाछ पर
खंजन सिखा उतार
वृद्ध हुवा मेह माघजी

“मटकी में माखण ठरण लागै, छोटै-छोटै दाणां रै रूप में छाछा माथै दीखण लागै अर खंजना पक्षी रै सिर सूं सिखा उतर जावै तो हे माघजी!  समझलौ क मेह बूढौ परौ हुयौ।”

इण भांत रै आं अणमोल सूत्रां में मौसम विज्ञान रा गूढ रहस छिपियोड़ा है।

स्रोत
  • पोथी : माणक पारिवारिक राजस्थानी मासिक ,
  • सिरजक : भोजराज द्विवेदी ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन ,
  • संस्करण : जुलाई 1989
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