रुतराज बसन्त रौ आगमण आदि काळ सूं ही सारी सिस्टि में जड़ अर चेतन में अेक नवो जीवण देतो रह्यो है। आपणै देस रै हरेक प्रान्त में बसन्त रुत रो स्वागत आप-आप रै निराळै ढंग सूं करता आया है। संस्कृत री जूनी पोथ्यां पढ़बा सूं पतो लागै कै प्राचीन काळ में बसन्त रुत में घणा-घणा उच्छब होता। बसन्त महोछब अर वन-विहार रा उच्छबां अर घटनावां पर घणी गाथावां अऱ नाटक महाकवियां रा लिख्या हुया है। बसन्त अर बरखा रुत रो उमंग, आणंद अर भावना सूं जितरो बखाण कर्‌यो गयो है उतरो और कोई दूजी रुत रो नहीं। साहित में प्रकृति रो वरणन कठै देखणो हो तो सिवाय बसन्त अर बिरखा रै तीजो नाम ही नीं दीखै।

यूं तो रुत छः है। जीवणदायिनी, सुख-संपत देवा वाळी, अर हजारां गुणां सूं भरी बिरखा रुत है, पण रुतराज री पदवी, अतरा गुणा वाळी होतां हुयां भी बरखा रुत नैं नीं दे बसन्त रुत रै माथै ही राजमुकुट मेल्यो गयो। यां दिनां में डील में फुरती, मन में उमंग, हिरदै में आणद री नवी लहर, मिजाज में मस्ती अर बेफिकरी री लळक इसी हवा में भर जावै कै कवि मन री भावुकता माथो टेक ईं नैं राजपदवी दी अर साहित्य रै ऊंचै सिंघासण पै बैठाय, काव्य रा अखतां सूं पूजा करी।

असल में रुत है भी इसी। धरती रा धणियां करसां रै मूंडां आगै, सियाळै रै सी’ में पाणत कीधा, हर्‌या-हर्‌या खेत, धान रा कणां सूं भर्‌या झोला खावै। जो-गेहूं री डैंग्यां, तीखा-तीखा बाळां नैं ऊंचा कीधां, सीयाळै रै दाह सूं लड़’र करसां रा मनां नैं आत्मविस्वास सूं भरदे, फाळ रै बोझ सूं जमीन पै लोटता चणां रा गौड़ आंख्यां में सुहावणा सपना सजावै। आंख पूगै जितरै सरसूं रा पीळा-पीळा फूलां रा खेत बाग री सी सोभा देवै जद करसां रा मन हल्लोळा लेवा लागै। बै सारै परिस्रम नैं भूल जावै। बा’रा महीनां री मै’नत रो थाकेलो ईं बसन्त रुत में उतारवा लागै अर नवै बरस सूं नवी आसावां रा दीवा जोवै।

यां दिनां में सारी सिस्टि रो ही रंग बदळबा लागै। तीन महीनां रा करड़ी ठंड री नींद सूं रुत करूंट फेरती, आळस मरोड़ती उठै। हाड़ निकळ्या, स्री गंवाय नागा हुया रूंखड़ा में नवो जीव आय जावै, नवी-नवी लाल पत्तियां, झुक-झुक अदब सूं मुजरो करबा लागै। कोयलां रा सावण महीनै सूं सींव्या लगा कंठ खुलबा लागै। सारो बन केसूलां रा फूलां री चूंदड़ी ओढ़ नवी बीनणी बण जावै। बेलड़्यां बिरछां रा कांधां पै लटकबा लागै। कळ्यां फूल बण जाबा री त्यारी करै, फूल पराग लुटाबा नैं भंवरा नैं नूंता देबा लागै! भंवर रस सूं मूंडो भर्‌यां कंवळां रै ओळूं-दोळूं घूमर घालबा लागै। कदैई कळ्यां रै कानां में बातां सुणबां नैं कनैं जावै, कदैई कंवळ नेह में बंद हो सारी रात कैद में रैवै। बतखां पाणी में कलोळां करबा लागै। हिरण चरबा नैं खेत री बाड़ां कूदबा लागै। काती में खिरी मोर री पूंछा पाछी नवी निकळबा लागै। आंबां रै नवा मोड़ निकळ-निकळ, सुवां अर कोयलां नै आसा अर आणद रा सनेसा सुणावै। ईं रुत री सरुआत बसन्त पंचमी करै। गेहूं री डैंग्यां (बाळां), सरसूं रा फूल आंबां रा मोड़ (बौर) नैं कळापूर्ण ढंग सूं पाणी भर्‌यां लोटां में सजायां, थाळी में गुलाल भर्‌यां, बसन्त पंचमी रै दिन, दिन ऊगतां ढोलण्यां ढोल पै धमाको देती गाय’र चेतावै– ‘बसन्त आई रै सुहावणी हिल-मिल खेलो कामणी’। सांचै नर नारी चेत जावै। थोड़ी देर पछै बसन्ती पागां अर बसन्ती साड़्यां पै’र अैलाण करदे कै अबै यां दो महीनां तो प्रकृति रै साथै मिल जावांला। दोड़्या-दोड़्या स्रीनाथजी रै मंदिरां में जावै, आगै स्रीजी बाबा रजाई फैंक, सीगड़ी मंदिर बारै नांख बसन्ती रंग री पोसाक धारण कीधां, गुलाल री कूंड़ी भर दरसण करबा नैं आबा वाळां पै गुलाल री मूठ्या फैंकाय हुकम बकसै ‘जाओ थांई फागां खेलो’। धूम-धाम सरू हो जावै।

फागण लागतां ही लुगायां रो झूमको अेक साथै बैठ गाय’र आपरै मन री हूंस जतावा लागै– ‘फागण आयो, मेवाड़ा म्हानै फागणियां रंगाय द्‌यो’ घणीकरां री सोख पूरी होभी जावै। रूस्या लोगां नैं मनाय देणो भी ईं रित री विसेसता रही है। ईं खूबी सूं वाकबदार लुगायां मानी पुरसां नैं मनाबा री तरकीब बताती लगी, नाक तक घूंघटो काढ़, होठां पर अेक आंगळी मेल उगेरै, ‘दारु में मारू नैं मनाय लेस्यां रै, दारूड़ी’। घणी जण्यां मनाय भी लेंवै। वास्तव में अै महींना नाचबा-गाबा, हंसी-मजाक राग-रंग उत्सव रा है। नेम, मरजादा अर डोफर सूं बधी लगी पुरम जात भी आपरा बणाया बंधणा नै तोड़, रै प्रवाह में ही बह जावै। मरजादा नैं ऊंची ताक पै मे झुण्ड रा झुण्ड नाचबा गाबा लागै। ऊंच-नीच रो भेद भूल जावै। समाज रा आचार-बिचार रा बन्दी मिनख भी मस्त हो जावै प्रकृति रै साथै पळी आदि जातियां रो तो पूछणो ही कांई! मनोभावां नैं घणी सरळता अर स्वच्छन्दता सूं गीतां में गाय-गाय रात-दिन नाचै।

उड़दू री या शेर–

‘जाहिद को जो हुआ पीने का नया चस्का।

कुजा जो वजू का था पैमाना बना डाला’॥

भगवान जाणै बांरी सुणी लगी है कै नीं पण डफ ले बै जरूर गावै ‘चरणामत री बाटक्यां में भर-भर दारू प्यायो ओ’।

‘फागण फागां सूं’– इयां तो फाग सात प्रकार री है। आप-आपरी हैसियत, ऊमर अर सोख सारू जणां फागां खेलै।

राणाजी री हाथी री फागां घणी प्रसिद्ध रही है। हाथ्यां रा होदां पै गुलालां रा ढिगला अर दोई कानी सूं हाथ्यां री काळी घटा, गुलाल रै अंबर में धोळा-धोळा दांत चमकाती दोड़ती को अेक अजब नजारो हो जातो।

आमोद अर प्रमोद रै बगत भी वीर रजपूतां नैं वीरता सूं खेलणो ही प्यारो लागतो। बै घोड़ा री फाग खेलता। घोड़ां रै दोई बगलां में गुलाल सूं भर्‌या थैला लटकाय, अेक हाथ में लगाम झेल्यां, दूजै हाथ में गुलाल भर्‌यां, चोड़ै चौगान में, घोड़ा फैं देता। घोड़ां रा खुरां सूं उड़ती खेह’र गुलाल री गर्द सूं घोड़ा अर सवारां री आंख्यां भरी जाय री है, घोड़ा नटाटूट दोड़्या जाय रया है, आछो सवार दांतां में लगाम पकड़ दोई हाथां री मुठ्यां सूं गुलाल रा निसाना लगातो जाय रयो, देखबा वाळां रै रोमांच हो-हो जावै। हाथी पै चढ़ गांव रा नर-नारियां फाग खेलबा निकळै। दुकानां री, घरां री छातां पै ऊभी लुगायां, रंग रै पाणी री बालटियां अर घड़ा भर-भर छांटै। छात री अर हाथी री ऊंचाई अेकसी बरोबर हो जाणै सूं सारै गांव री लुगायां मन भर पाणी फैंक-फैंक फाग खेलै। हाथी रै पीठ पै लटकी बालटियां सूं डोलच्यां भर-भर लुगायां पै पाणी उछाळै।

सोखीन अर अमीरात वाळा गुलालगोटां री फाग खेलै। चपड़ी री हळकी-हळकी फूलां जिसी फोरी, गेंदां बणाय, रंगबिरंगी गुलालां भर स्त्रियां रै साथै बांसूं खेलै, कोमळांगियां रै कंठै ही लाग नीं जावै। बां गुलाल री गेंदां री मारै जो जाणै फूलां री लागी, पतासां री नांई फट फूट जावै, गुलाल बिखर जावै। गुलालगोटां रा ताक-ताक, कस-कस निसानां लगावै। या फाग घणी अमीर हुवै। फूलां री फाग भी खेलता हा। फूलां रो ढिगलो कर, बादळो (कांगरी रा तारां रा झीणा-झीणा टुकड़ा) मिलाय, बां सूं खेलता। आज पढ़बा वाळा नैं या बात भलां ही कहाणी सी लागै पण आज ही घणा ही जणा मोजूद है जो इसी फाग खेल्यां लगा है। बागां में मणां बन्द गुलाब रा फूल रोजीना उतरणो मामूली बात ही। आज भी गुलाब री खेती हो री है। डोलचियां री फाग लोगां री घणी लाडली रही है। नर-नारी आपस में डोलचियां में पाणी भर-भर छांटै। डोलची बावणो भी अेक कळा है। दाना बूढ़ां नैं आजकाल रा जवानां पर अफ़सोस है कै यांनैं डोलची बावण रा ही सूर कोयनीं। वै आपै में आय डोलची उठाय भींत पै पाणी रो फटकारो मारै जीं रै लारै रो लारै चूनै रो लेवड़ो आय पड़ै धड़ाक। झट गाबड़ हिलाय बतावै। ‘फागां यूं खेलीजै बेटा!’

चैत महीनै में गुलाब फूटै, कैसूला तड़कै, बणराय पांगरै, सेवंती फूलै, चंपा रै फूल आवै, नीमड़ै रै खीचड़ी लागै अर आफू रा फूलां सूं खेत लाल-लाल हो जावै। छोर्‌यां फूल तोड़-तोड़ पूजा करबा नै, गैणां बणाबा नैं उतावळी हो जावै। दस-दस बीस-बीस रा झूलरा रा झूलरा ‘फूल पाती’ लेबा नैं बन में, बागां में गावता निकळ जावै। मांवां समझावै।

‘बाई अे आफू रा फूल थोड़ा ही चूंटज्यो

जुवानां नैं देख मती मुळकज्यो।

बूढ़ा नैं देख मती हंसज्यो।’

लोटां में फूल पती कलात्मक ढंग सूं सजा गाती-गाती तळाव री पाळ पै आवै। आप री जलमभोम मेवाड़ रै पाणी सूं लब-थब भर्‌या तळाव, वांरै माथै झूक्या लगा छाजा वाळा गोखड़ा रा रूपां री तळाव रै पाणी में पड़ती छाया नैं निरखती-निरखती कैवै ‘ऊंचा राणाजी थांरा गोखड़ा, नीचै पिछोला री पाळ।’ इस्यै रूपाळै, डूंगरां री गोद में रमतै पाणी रै माथै तिरतै देस नैं छोड सासरै जावण री कल्पना हियो फाड़, कण्ठ सूं राग काढै– ‘किम कर जावूं रै परदेस व्हालाजी, म्हांनै आछो लागै राणा जी रो देसड़ो रै’।

गुलाब फुलवा लागै। उसा-काळ में कळी ‘चट’ री आवाज करती फूट’र फूल बण जावै। ‘चट-चट’ फूटबा री आवाज करती गुलाब री कळियां रै खेत में सोबा वाळा भगवान ईज जाणै कै बसन्त री सुसमा जीं वेळा किसीक हुवै! कळी फूल बणती बखत सोरभ रो किस्योक मीठो सांस छोड़ै! ऊपर आंबै री डाळ पै बैठी कोयल ‘कूक’ कर सुवै री नींद रा मीठा गुटकां में मिठास घोळ दे। डाळा पर सूं माथै झर-झर आंबां रा मोड़ झरै।

पुसपां री गन्ध सूं भारी हुयो पवन, आंख्यां री पलकां नैं और ही भारी कर दे! सूवां रा झुण्ड हर्‌या-हर्‌या पांखड़ा खोल उड़बा री तैयारी करै। इसै मौसम में गणगौर रो तेंवार आवै। ‘खेलण द्‌यो गणगौर पना मारू म्हानै खेलण द्‌यो गणगौर’ री रट करती खेलबा लागै। रात-दिन गाणो-नाचणो। आधी-आधी रात तांई घूघरा बजाती घूमर-सालेड़ लेती रैवै।

‘थे म्हारै आज्यो पावणा, सैं गणगौर्‌यां री रात’ रा वचन ले पति नैं परदेस जाबा देबा वाळी, गणगोर पै आयो लगो नीं देख ताड़ा-तोड़ जीव करती सिकायत करै– ‘ऊंची चढ़ू’र नींची उतरूं, जोवूं थांरी बाट, बेगा पधारो नीं प्यारा पावणा’।

संजोगणियां गोखड़ा में बैठ सुणाय-सुणाय गावै– ‘थां रै मैंदी ज्यूं रच जावूं रै म्हारै सैण।’ पड़ूत्तर में– ‘थारो यो झोंको म्हानै प्यारो लागै अै मीठाबोलणी’ सुण तिरपत हो दूणै उछाह सूं कोयला सूं कोयलां रै लारै लारै कूक-कूक बैई गाबा लागै।

ईं तैंवार में कोयलां रा कण्ठ विव्हलता भर दीधी, गुलाब रा फूलां रो रस पी भंवरा में मधु रो मिठास घाल दीधो। पंचसर रै मार री ईं में वेदना है। नवा निकळता पत्तां री सी अधीरता है अर यौवन रो सो नसो है। मानव मन-सरोवर रो तैरू हीज ईं तिंवार रो मरम अर आणंद जाण सकै।

स्रोत
  • पोथी : राजस्थानी निबंध संग्रह ,
  • सिरजक : रानी लक्ष्मीकुमारी चूंडावत ,
  • संपादक : चन्द्रसिंह बिरकाळी ,
  • प्रकाशक : राजस्थान साहित्य अकादेमी (संगम), उदयपुर
जुड़्योड़ा विसै