भारत रै इतिहास में राजस्थानी भाषा अर उणरौ साहित्य घणौ महताऊ है। राजस्थानी माता री मूरती बणाई जावै तो अेक हाथ में तलवार अर दूजोड़ै में वीणा देवणौ ठीक फाबैला। अठै रौ लोक साहित्य लोक जीवण रौ दरपण है। लोकगीत,लोक-संस्कृति रौ घर है। राजस्थान रा लोकगीत संसार रै खूणै-खूणै में गूंजै के 'धरती धोरां री मीठा मोरां री', 'केसरिया बालम आवौ नीं पधारौ म्हारै देस में।' ठीक इणी तरै अठै रै समाज में फागण गीतां रौ भी घणौ फूटरापौ है—म्हारै राई सी भौजाई, कान्हकंवर सो वीरौ, ढोलौ हजारी गुल रौ फूल, चम्पा री पीळी पांखड़ी। अैड़ी-अैड़ी उपमा गीतां में मौजूद है।
मधरा मुळकता फिरै, मदछकिया नर-नार।
सगळां माथै पड़ रही, फागण री फटकार॥
इकलाली जोबन तणी, तिण पर लागी गुलाल।
फागण म्हीनै सायबा, थां बिनबुरा हवाल॥
फागण म्हीनै लग रही, तन अर मन में आग
जिणरा सायब घर बसै, उणरा ऊंचा भाग॥
प्रीत रंग में भींज नै, आणद हुयौ अपार।
होळी रौ रंग अेक है, सायब रंग हजार॥
अबकी फागण बरसियौ, रंग रंगीलौ मेह।
प्रीतम पूरी रंग दी, प्रीत रंग में देह॥
राजस्थान रा फागण गीत बसन्त रा फूलां ज्यूं खिलियोड़ा अर रंग-बिरंगा है, उणरा न्यारा-न्यारा रंग अर न्यारी-न्यारी महक है, वां नै सुणतां मिनख रौ मन चुकळीज जावै के किसौ गीत सुणां अर किसौ नीं सुणां? ज्यूं रंग-बिरंगा फूलां नै देख’र भंवरा भरमीज जावै के किसा फूलां माथै बैठूं अर किसां माथै नीं बैठूं! इण गीतां में जोबण अर विरह रा गीत है, तो कुंवारी काम-पीड़ा रा भी गीत है। केई गीतां में बेमेल बूढै खांविंद रौ दुखड़ौ है तो केई गीतां में छोटौ परणायौ, उणरी मरमीली मजबूरी है। फागण बसन्त रौ प्रतीक है। फागण रौ महीनौ आवतां ई बसन्त लैरां ले उडै, प्रकृति सौळै सिंणगार कर’र अंगड़ाई लेवै, बाग-बगीचां में नवी कूंपळां फूटै। कोयलड़ी पांच राग मे कहूकै, धरती में नवी चेतणा जागै। अर जड़-चेतन में प्रेम राग रौ फव्वारौ छूटै तद फागण मस्ती लेतौ लोक जीवण री भावना में नाच नचावतौ आवै के—
'चंग नै झींझा री जोड़ी बड़ली हेटै बाजै रे दोनूं हाथ रूमालिया कंवरजी नाचै रे हालौ देखण नै हां रे हालौ देखणं नै।'
घणी छिंया बड़लै री, सिरदारां जाजम ढाळी रे
जाजमड़ी ढाळ नै कसब मावै लीन्दौ रे भूरी डळियां रौ,
सिरदारां थारी बेल बधजो रे हां रे भूरी डळियां रौ...
किलै में भवानी बोलै बाळ किणरौ रोवै रे
नवमै म्हीनै भंवरजी पाळणियै हींडै रे ताणियां रेशम री,
हां रे तणियां रेशम री।
मारवाड़ रा फागण गीत तो राजस्थान रौ खजानौ है। प्रकृति में नवी कूंपळां फूटै अर मिनख रै रगत में नवौ उमाव आवै। इण उमाव नै अभिव्यक्ति देवण खातर फागण रा गीत नर-नारी गावै। आं गीतां में औ जरूरी नीं है के सगळा गीत फूहड़ अर फीटा'इज होवै। केई वार होरियां में राम, लिछमण अर शिवजी री महिमा गावीजै तो केई गीतां मे लोक देवतावां रा बखाण करीजै। केई गीतां में लोकनायकां रै बलिदान री गाथा याद करी जावै। उत्तर प्रदेश में ज्यूं आल्हा गाईजै ज्यूं ही इण मौकै राजस्थान रा वां वीरां नै जनता गीतां रै माध्यम सूं याद करै, जिका देश री आजादी अर समाज री मरजादा खातर कुरबानी दी। अैड़ा गीतां री संख्या तो घणी है, पण थोड़ी सी बानगी आपरै सामी राखूं। शिवजी रै भोळै अर मस्तानै रूप नै याद करतां जनता गावै—
आछौ गांजौ पीले रे।
सदा रे सिव भोळा अमली
गांजौ पीले रे।
कठै रे बवाडूं थारौ हरियौ-हरियौ मरवौ
कठै रे बवाडूं लड़ गांजै री
गांजौ पीले रे।
इण गीत नै सुणतां ई मरवै री महक सूं हियौ महकीजण ढूक जावै, तो गांजै रा गमगेर गीत गावण वाळां नै अर सुणण वाळां नै मस्त कर देवै। इणी तरह राम अर लिछमण री जोड़ी रौ बखाण फाग गीतां में घणौ बढ़िया हुयौ है। लिछमण रै सगतीबाण लागौ, जिणरौ वरणन अेक गीत में देखौ—
बाण लग्यौ रे सगती रे लिछमण रै
हां रे लिछमण रे।
काहै सूं जीवावै माता सीता सतवन्ती
काहै सूं जीवावै हडूमान जती रे लिछमण रे।
इण तरह रा गीतां रै अलावा लोकनायकां नै याद करणिया गीत ई है, जका फिरंगियां नै मार-भगावण री ललकार ई गरबीलै अर साफ सबदां में दीवी। अठै रा मिनखां में अंगरेजां सारू कैड़ा भाव हा। अंगरेजी राज रौ राजस्थान माथै कांईं असर पड़ियौ, उण रौ चितराम अठै रा फागण गीतां में आज ई गाईजै—
मोडकी मगरी रौ पाणी
ढाळौ ढाळ ढळियौ रे
आवू थारा पाड़ां में
अंगरेज बड़ियौ रे
क काळी टोपी रौ देस में
छाबणियां न्हांखी रे
क काळी टोपी रौ
देस में अंगरेज आयौ
कांई-कांई लायौ रे
फूट न्हांखी भायां में
बेगार लायौ रे
घोड़ा रोवै घास नै
टाबरिया रोवै दाणां नै
बुरजां में ठकराण्या रोवै
जामण-जाया नै
क रोळौ बापरियौ
वा वा रोळौ बापरियौ।
आं लोक गीतां सूं ठा पड़ै के सारौ राजस्थान आपरी रीत-पांत री रुखाळी में मगन-मस्त हौ। इण सूं औ भी पतौ पड़ै के टाबरिया अंगरेजां रै राज में दाणै-दाणै सारू विलख रह्या हा। जिनावरां सारू घास ई खूटग्यौ हौ। जद आऊवा ठाकर खुशाल सिंहजी अर आसोप रा ठाकर शिवनाथ सिंह जी फिरंगियां सूं लड़िया अर अंगरेज मेजर मेशन रौ माथौ काट’र आउवा गढ रै नीचै लटका दियौ, ज्यां री वीरता रौ फूटरापौ फागण रा गीतां में आज ई गूंजै—
ढोल बाजै थाळी बाजै भेळौ बाजै बांकियौ
अैजंट नै मार'नै दरवाजै न्हांखियौ।
आउवौ आसोप धणियां मोतियां री माळाओ
बारै न्हांखौ कूंचिया तोड़ाया ताळा ओ
अठै रा फागण-गीतां री सच्चाई आ है के जद मारवाड़ में नवी-नवी रेलगाडी सरू होई उणरौ वरणन कीं इण भांत होयौ—
पाली नै जोधाणै बिचै
लांबी सड़कां घाली रे
लांबी सड़कां घाल नै
चलाई गाडी रै बिना बळदां री
रे'क बिना बळदा री
अंगरेज थारौ हूनर भारी रे।
फागण महीनै में मिनख तो गळी-गळी अर मोहल्लै-मोहल्लै में फागण गावता मस्ती लेवै अर लुगायां लूहर लेवती घूमर घालै। कैवण रौ मतलब औ के फागण में चंग रा धमीड़ा उठै अर लूहरां री रिमझोळ माचै।
जिणरौ फूटरापौ लुगायां री वाणी में यूं गावीजै—
रात ठंडी चांदणी सेजां में बाटां जोवूं रे
कीकर आवै नींदड़ली म्हैं सूती रोवूं रे
क बूढौ परणायौ! हां रे बूढा परणायौ!
बाबलियौ पईसां रौ लोभी रे क बूढौ परणायौ
काजळिया अंगरखी म्हारी
छाती काळी पड़गी रे
गुलगुलियै गालां रै माथै छींया पड़गी रे
क रीसां बळबळ नै
इण मोलियै माटी रै लारै
रे'क रीसां बळबळ नै
राजस्थान रा फागण गीतां में सिणगार रौ वरणन भी घणौ लूंठौ है, जिण में अठै रा लोगां रौ जीवण-दरसण सामी आवै—
पाली सूं लखारौ आयौ लीली लाखां लायौ रे,
गांव रै चौवटै बीच हाट मांडी रे'क हालौ देखण नै।
हांरे हालौ देखण नै
नैनी-नैनी मैंदी म्हारै नणदल बाई दीनी रे
पांच-पचेटा म्हारै म्हारी सौक दीना रे बळतै काळजियै,
हां रे बळतै काळजियै
हाथां री मैंदी काळी पड़गी रे बळतै काळजियै
मारग में धमीड़ा ऊठै गाडौ किणरौ आवै रे
ठालौबूलौ जेठजी लेवण नै आयौ रै लाखै जावूं नीं।
हां रे लाखै जावूं नीं
गेहली साथणियां थे मोरियौ भलांई गावौ रे लाखै जावूं नीं।
राजस्थान में फागण रा अजब रंग अर गजब ढंग। मिनखां री रग-रग में काईं ठा कठै सूं अैड़ी मस्ती बापरै के रूं-रूं कूदड़का करण ढूकै, भूल जावै सगळा दुखड़ा, कूदण लागै नव-नव ताळ—
भारत वाळां भार सारौ खांधै लियां फिरतौ रे
कदैभी नीं डरतौ डोकरियौ वौ सांची कहतो रे गांधी महात्मा,
हांरे गांधी महात्मा
दुनियां री मोटी आत्मा'क गांधी महात्मा!
इण तरह राजस्थान री संस्कृति रौ अेक रूपाळौ चितराम फागण रा गीतां में देखण मिळै, जिण में नारी अर पुरुष री स्वाभाविक भावनावां अर उदवेग आपरै पूरै जोश अर उमाव रै साथै प्रगटै अर मिनख री काम भावनावां नै अभिव्यक्ति, रूपाळौ रंग अर राचणौ रूपक देवै।