रैड़ भी एक प्राचीन स्थल है, जो पुरातात्त्विक सम्पदा से भरपूर है। जयपुर से 90 किलोमीटर दक्षिण में स्थित रैड़ पूर्व जयपुर रियासत की बौंली तहसील में भरतला ठिकाने का गाँव था। अब यह निवाई तहसील में है। यहाँ पर हुए उत्खनन से ई. पूर्व तीसरी शती से लेकर ईसा की द्वितीय शती तक के अवशेष प्राप्त हुए हैं। कुछ अवशेष गुप्तकालीन भी मिले हैं। शोषण कूप बड़ी संख्या में खुदाई में मिले हैं। यहाँ से मिले घेरदार कूपों की संख्या 115 थी। इनमें 5 से लेकर 25 घेरे एक दूसरे पर स्थित हैं। हर घेरा दो फूट दो इंच चौड़ा तथा लगभग सात इंच ऊँचा है। इनकी मोटाई आधी इंच है। इनमें टूटे जाले, मणके तथा मृण्मय कलाकृतियाँ पाई गई हैं। कुछ में अनाज के दाने भी मिले हैं। कुछ घेरे शोषणगत रूप में आवासीय घरों में थे, जिनकी गहराई 17 फुट से लेकर 19 फुट सवा चार इंच पायी गई।
यहाँ के उत्खनन से तीन हजार आहत मुद्राएँ मिली हैं। इनके अलावा मालवा और मित्र सिक्के भी मिले हैं। यहाँ से मिलने वाले सिक्कों में 14 मित्र सिक्के, 6 सेनापति सिक्के, 7 वपु सिक्के, एक अपोलोडोटस का सिक्का, 189 अज्ञात ताम्र सिक्के और इनोसासानियन सिक्के शामिल थे।
रैड़ के उत्खनन से मृण्मय मूर्तियाँ भी बड़ी संख्या में प्राप्त हुई थीं। इनमें मातृकाओं की एवं पशुओं की मूर्तियाँ हैं। यहाँ से मणके और मोहरें भी मिली हैं। एक शीशे की मोहर पर ‘मालवजनपदस’ अंकित है। यह ब्राह्मी लिपि में अंकित है। लोहे के औजार भी बड़ी संख्या में खुदाई में मिले हैं, जिससे किसी लोहे के कारखाने की स्थिति का बात की सम्भावना बनती है। कलाचिह्न युक्त टुकड़े, घुमावदार हत्था खोखले ढक्कन, घुण्डी सहित ढक्कन, छोटी बोतलनुमा सुराहियाँ आदि ईसा की प्रथम शती से सम्बन्धित हैं। समानान्तर भित्तियाँ मिली हैं, जिनकी समता मोहन-जोदड़ो से प्राप्त भित्तियों से की जा सकती है। यहाँ से ताँबे, सीसे, चाँदी और सोने से निर्मित वस्तुएँ भी मिली हैं।
रैड़ का उत्खनन सन् 1938 में के.एन. पुरी द्वारा किया था। यहाँ पर अनेक छोटे धूल के टीले फैले हुए हैं। यहाँ से मिट्टी के मकान, लौह उपकरण, पाषाण मणके एवं विविध प्रकार की मृण्मय मूर्तियाँ सम्मिलित हैं। ये सभी शुंग और उसके उत्तर काल से सम्बन्धित हैं। चुनार के बलुआ का प्याला मिला है, जो काल निर्धारण में सहायता करता है। सेलखड़ी की डिबियाओं में बौद्ध भिक्षुओं के अवशेष पाये गये हैं।
रैड़ ईसा पूर्व तीसरी शती में एक समृद्ध नगर था। इसकी समृद्धि ईसा की दूसरी शती तक बनी रही। मालव सिक्के एवं आहत मुद्राओं के मिलने से ज्ञात होता है कि रैड़ की एक मालव उस समय मौर्य या शुंग शासकों के अधीन थे। सेनापति वचछोप के सेनापति सिक्के उनके स्वतन्त्र होने की घोषणा करते हैं। यह स्वतन्त्रता अल्पकालीन ही रही। यहाँ से प्राप्त सूर्यमित्र, ब्रह्ममित्र और श्रुवमित्र सिक्के मथुरा और कन्नौज से भी प्राप्त हुए हैं। सिक्कों पर उदेहि की ब्राह्मी लिपि में अंकित है। इनके पृष्ठ भाग में नन्दीपद और सूपध्वज अथवा त्रिकोणाकार ध्वज अंकित है। एक सिक्के का वजन 44 ग्रेन है तथा इसका आकार चौकोर है।
रैड़ 26”20’ उत्तरी तथा 70°10’ पूर्वी देशान्तर के बीच अवस्थित है। आजकल यह एक छोटा सा गाँव है, जो जयपुर जिले के निवाई रेलवे स्टेशन से दक्षिण पूर्व में 24 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। यह बनास की सहायक ढील नदी के तट पर बसा है। रैड़ चारों ओर से गिरि पंक्तियों से आवृत्त है। इनका प्राचीन नाम ज्ञात नहीं है। किसी समय यह व्यापारिक और धातुकर्मीय केन्द्र रहा था। इसकी स्थापना ईसा पूर्व तीसरी शती में हुई प्रतीत होती है। यह ईसा की दूसरी शती तक समृद्ध नगर रहा है। तीन बार यह उजड़ा और फिर बसा है।
तीसरी शती में रैड़ मौर्य साम्राज्य का एक भाग था। यहाँ से 3075 के आहत सिक्के खुदाई में मिले हैं, जो द्वितीय शती में भूमि में गाड़ दिये गये थे। इस समय मौर्य साम्राज्य की पतनावस्था आ गयी थी, जिससे खतरा बढ़ चला था। आर एन. पुरी के एक सिक्के पर अंकित सेनापतिस वच्छघोष के सेनापति को वच्छघोष से सम्बन्धित माना और इसे सेनापति वच्छघोष का लेख माना। उन्होंने इसे शुंगवंश के संस्थापक पुष्यमित्र से सम्बन्धित माना। दूसरी ओर डी सी सरकार ने वच्छघोष के ‘स’ को प्रत्यय मानकर सेनापति का नाम वच्छघोष अथवा वच्छाष माना तथा इसे प्रान्तीय गवर्नर बताया। रैड़ से जो सिक्के मिले हैं, उनके सात चौकोर सिक्के भी हैं जिन पर ‘वषु’ लेख प्रारम्भिक ब्राह्मी लिपित में अंकित है। पुरी के अनुसार ये सिक्के किसी मालव सरदार के हैं। के.एन. दीक्षित इन्हें 250-150 ईसा पूर्व के मानते हैं। वसुभूतिस और शर्वदत्त या शरमदंत नाम से दो मोहरों पर अंकित पाया गया है।
अधिकांश मोहरों पर ‘म’ अक्षर लिखा हुआ आता है।
कुषाण शक्ति और उनके सरदार पश्चिमी क्षत्रपों के उदय के कारण मालवों की शक्ति को क्षति पहुँची। इस समय रैड़ भी उजड़ गया। यह बात उत्खनन से सतहों से ज्ञात होती है। अपर सूर्यमित्र और ध्रुवमित्र सिक्कों का उल्लेख किया गया है। इन सिक्कों के पृष्ठभाग पर मछली युक्त विसर्पी नदी का अंकन है तथा मुख्य भाग पर एक साण्ड है। ध्रुवमित्र सिक्कों पर मुख्य भाग पर हाथी अंकित है। इस पर ‘सुदवप’ लेख अंकित है जो या तो उपाधि या कौटुम्बिक नाम है।
रैड़ का टीला पूर्व से पश्चिम 2500 फीट लम्बा है और 1800 फीट चौड़ा तथा 15 से 25 फीट नदी तल से ऊँचा है। ढील इसे तीन दिशा में घेर कर बहती है। रैड़ की दीवारें मोरेड़ी मिट्टी से बनी हुई थीं। इसी से मकानों के आँगन बनते थे। गीली मिट्टी का प्लास्टर दीवारों पर किया जाता था। केवल तीन ईंटों से निर्मित घर खुदाई में मिले हैं। चबूतरा बनाने के लिए असाधारण रूप से बड़ी ईंटों का प्रयोग किया जाता था। नींव की सामानान्तर दीवारों से बड़ी मोरंडी मिट्टी भर दी जाती थी। दीमकों को दूर रखने के लिए नींव में लोहे का चूरा डाला जाता था। मकानों की छतें झुकती हुई टायलों वाली थीं जो त्रिअंकी दीवालों पर उठी हुई होती थीं।
रैड़ में पाये गये सभी बर्तन चक्र से निर्मित हैं। बर्तनों पर पेन्ट नहीं की गयी है, लेकिन इन पर कुछ सजावटी डिजाइनें की गई हैं, जैसे स्वस्तिक, त्रिरत्न और वृषभ चिह्न। गोबर, गेहूँ की भूसी, भूसी आदि को मिट्टी में मिलाया जाता था।
विभिन्न प्रकार के मिट्टी के बर्तन रैड़ से मिले हैं। छिद्र युक्त मृण्मय बर्तन बाहर से आयातित किए जाते थे। बौद्ध बर्तन बाहर से आते थे। तीसरी शती में ये बैराठ में मिलते थे। हैण्डल और टोंटीदार बर्तन कलश अच्छी संख्या में प्राप्त हुए हैं। धारीदार बर्तन काफी मात्रा में बनाए जाते थे। पशु मानवीय बर्तन जो बंदर के आकार में मिले हैं, सम्भवतः खिलौनों के रूप में प्रयुक्त होते थे। कई प्रकार के कलश मिले हैं। तश्तरी और शकोरों की खूब मांग थी। लोटे के आकार के बर्तन पानी के काम में आते थे। टोंटीदार पात्र और टम्बलर सिक्कों को रखने के काम आते थे। बड़े-बड़े जारों में पानी एकत्रित किया जाता था।
पत्थर के बर्तन मुख्यतया सेलखड़ी पत्थर के बनते थे। इस पत्थर की बनी पेटियों मिली हैं। पॉलिश किया हुआ चुनार पत्थर से निर्मित एक प्याला भी मिला है जो बाहर से आया है। बर्तन लौह धातु के बने हुए हैं जिनमें गोल आधार वाली तश्तरियाँ हैं।
मृण्मयी मूर्तियाँ बड़ी संख्या में खुदाई में मिली है। कुछ सजावट के लिए घरों में प्रयुक्त होती थीं। अन्य बच्चों के खिलौनों के रूप में प्रयुक्त होती थीं। हाथी पर सवार पुरुष, घुड़सवार, यक्षी, एक बिल्कुल नग्न पुरुषाकृति और कई नारी मूर्तियाँ मिली हैं।
रैड़ में लोहे के कारखाने थे, जिनमें औजार बनाए जाते थे। सम्भावना है कि रैड़ के पास कोई लोहे की खान थी। हथियारों में तलवार, धारदार पत्तियों, भाला, भाले का अन्त भाग, छोटी दुरिकाएँ, चाकू और कुछ बाणाग्र भाग मिले हैं। रैड़ के लोगों को वस्त्र का ज्ञान था। राजस्थान में रुई उत्पन्न होती थी जिससे कपड़े बनते थे। तकली चक्कारों की प्राप्ति से ज्ञात होता है कि कताई खूब होती थी। पुरुष और नारी की मृण्मय मूर्तियों से लोगों की पोशाक और गहनों का पता चलता है। पुरुष छोटी धोती” और जैकेट पहनते, पगड़ी लगाते थे, स्त्रियाँ स्कर्ट पहनती थीं और साड़ी की तरह का वस्त्र सामने के भाग पर गहराई से लपेटती थीं। घाघरे पर तीन लड़ वाली तागड़ी पहनती थीं। स्तन भाग अनावृत होता या फिर कोई तंग पोशाक इस भाग पर पहनी जाती थी कभी-कभी दुपट्टा भी लगाया जाता था।
स्त्रियाँ विभिन्न प्रकार के गहने पहनती थीं। इनमें चूड़ियाँ, कंगन, माला, कर्णफूल और तागड़ी होती थी। माला पत्थर के विविध रंग वाले मणकों से बनायी जाती थीं। चूड़ियाँ सीपी, काँसा और पक्की मिट्टी से बनती थी। माला के मणके और तागड़ी के मणके सोने, सुलेमानी पत्थर, स्फटिक, जम्बुमणि, फिरोजा, जालवर्द, वैदूर्य, कांच सीपी और मिट्टीं के भाण्डों के बनते थे। कर्णफूल सीसे, काँसे और मृद्भाण्डों से बनाए जाते थे। अन्य आभूषण गोमेद का अण्डाकार टुकड़ा होता था। जो माला की शोभा बढ़ाता था। शृंगारिक एवं कान्तिवर्धक वस्तुओं से लोग परिचित थे। शृंगार के अन्य साधनों में सुरमा डालने की शलाकें, छोटी काँसे की बोतलें, एक गोलाकार काँसे का दर्पण और कज्जलदान थे जो शंख के टुकड़ों से मछली के आकार में बने हुए थे। लोग शनि के पूजक थे। शिव का महत्त्व द्विलीय श्रेणी का था। बौद्ध धर्म का यहाँ कोई प्रभाव नहीं था यद्यपि इन धर्मावलम्बियों से सम्पर्क था।