पिट्ठू, जिसे सतोळिया या लगोरी भी कहते हैं, राजस्थान के बच्चों का प्रिय परंपरागत खेल है। यह सात समतल पत्थरों और एक गेंद से खेला जाता है। इस खेल में दो टीमें होती हैं, जिसमें एक पक्ष पत्थरों के ढेर को गेंद से गिराता है और उसी पक्ष के अन्य खिलाड़ी गेंद के निशाने से बचते हुए इनको पुन: सजाते हैं। यह कार्य काफी चपलता और टीम वर्क से किया जाता है।
सतोलिया खेल की मुख्य विशेषताएं और नियम
आवश्यक सामग्री
इस खेल के लिए एक-दूसरे के ऊपर रखने के लिए सात चपटे पत्थर और एक टेनिस या रबर की गेंद की आवश्यकता होती है। ग्रामीण इलाकों में कपड़े से बनी हुई गेंद भी काम में ली जाती है।
टीम और खिलाड़ी
इसमें दो टीमें होती हैं। सामान्यतया हर टीम में 3 से 9 या कभी-कभी 12 खिलाड़ी (7 मैदान पर और 5 रिजर्व) हो सकते हैं।
खेल की प्रक्रिया
एक टीम का खिलाड़ी थोड़ी दूरी से गेंद मारकर पत्थरों के ढेर (सतोलिया) को गिराने का प्रयास करता है। यदि वह पत्थर गिरा देता है तो उसकी टीम को बिखरे पत्थरों को वापस एक-दूसरे के ऊपर रखना होता है। दूसरी टीम का काम उस खिलाड़ी को गेंद मारकर पत्थरों को सजाने से पहले 'आउट' करना होता है। अगर पत्थर सजाने वाली टीम कामयाब हो जाती है, तो उसे एक अंक (सतोलिया बोलना) मिलता है। अगर पूरी टीम आउट हो जाती है तो विरोधी टीम को मौका मिलता है।
सांस्कृतिक महत्व
पिट्ठू राजस्थान में मकर संक्रांति जैसे त्यौहारों पर विशेष रूप से खेला जाता है। यह खेल शारीरिक दक्षता (दौड़ना, निशाना लगाना) बढ़ाने के साथ-साथ टीम वर्क और रणनीतिक सोच भी विकसित करता है। आजकल यह खेल गांव की गलियों से निकलकर राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भी अपनी जगह बना रहा है, जिससे इसकी लोकप्रियता फिर से बढ़ रही है।