नलियासर जयपुर से पश्चिम में सांभर झील से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ पर एक बहुत बड़ा टीला है, जिस पर हुए उत्खनन से ईसा पूर्व की तीसरी शती से लेकर 10वीं शती तक के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इस खुदाई से चौहानों के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ मिलती हैं।

 

यहाँ से उत्खनन से प्राप्त वस्तुओं में आठ मुद्राएँ, उत्तर इण्डो सासानियन सिक्के, हुविष्क के सिक्के, इण्डो-ग्रीक सिक्के, यौधेयों के सिक्के और गुप्तकालीन चाँदी के सिक्के तथा सोने और ताम्बे की वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं। इनमें सोने के एक गले के हार का लटकन है, जिस पर पंखदार सिर की आकृति खुदी है। सोने पतरों से बने मणके, एक हृदय के आकार की स्वर्णवस्तु जिसके दोनों ओर सींग हैं, भी प्राप्त हुई है। स्वर्ण निर्मित खुदा हुआ सिंह-सिर या कीर्तिमुख भी मिला है।

 

ताम्बे की वस्तुओं में घण्टिका, चम्मच और छोटे बर्तन मिले हैं। मिट्टी के तोलने के बाट जो चौकोर हैं, प्राप्त हुए हैं। बड़े गेंद, छोटे गेंद, मिट्टी की छोटी तलवार और झुनझुन प्रकाश में आये हैं। झाँपे, गोल मिट्टी के तवे, अलंकृत ईंटें, नलियों के गोल पाइप, पूजा हेतु कुण्ड, पात्र मिट्टी के आभूषण, मिट्टी के मणके, धातु के मणके भी मिले हैं। पत्थर के सिलबट्टे, हड्डी का पासा, काँसे के बने बच्चों के कड़े और अंगूठियाँ मिली हैं।

 

105 ताम्र मुद्राएँ भी मिली हैं, जो कुषाणकालीन हैं। एक लेखयुक्त फलक मिला है, जिसका पाठ निम्न प्रकार से है—

 

तत (ततः) शासक काल (ति) तः सूर्य, (मव) ताराव, प्रियति, नीताः ग।

 

इसका काल ईसा की 2 शती से 4 शती सम्भव है। लेख की भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी है। काँसे की एक मुहर लेख सहित मिली है। सांभर की संस्कृति ईसा पूर्व भी तीसरी शती में उदित हुई और ईसा की छठी शती के पूर्व तिरोहित हो गई।

 

यहाँ से अनेक मृण्मय वस्तुएँ एवं मृद्भाण्ड भी मिले हैं, जो कुषाण या गुप्तकालीन हैं। इनमें एक कृति शिव की है, जिसके सिर पर मुकुट एवं हाथ में डमरु और गले में सर्प है। इसके दो भुजाएँ हैं। यज्ञोपवीत धारण किए हुए एक मानवाकृति है, महिषासुर का अंकन है। यक्षिणियों की आकृति है, उमा-महेश्वर, पात्रधारी कुबेर आदि हैं। चौपड़ के पासे भी मिले हैं, जो मिट्टी या हड्डी के बने हैं। लौह वस्तुओं में हँसिया, लटकने वाले दीप व औजार मिले हैं। टोंटियों युक्त जल पात्र मिले हैं। मकर सिर, सिंह सिर एवं वराह सिर खुदाई में मिले हैं।

 

नलियासर सांभर से जयपुर जाने वाली सड़क पर सांभर झील से 6 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। एक बड़ा टीला उत्तर से दक्षिण 2000 फीट लम्बा और 1800 फीट चौड़ा और 40 फीट ऊँचा है। यहाँ पर की गई खुदाई में दस खाइयाँ खोदी गई थीं। इनसे ज्ञात होता है कि यहाँ छः कालीय आवास रहा है। इन खण्डहरों से लोगों के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन की अच्छी झलक प्राप्त होती है।

 

सबसे नीचे के काल स्तर को पूर्व शुंग काल माना गया है। इस काल की आहत मुद्राएँ मिली हैं। दूसरे स्तर का काल ईसा पूर्व प्रथम शती है। तीसरा और चौथा स्तर कुषाणकालीन है, जिसमें आर्जुनायन, यौधेय, हुविष्क और अण्टीमकाओज निकेफारोस के सिक्के मिलते हैं। 5वाँ स्तर गुप्तकालीन है। छठा स्तर 9वीं या 10वीं शती से सम्बन्धित है। यहाँ से छः सासासनियम सिक्के मिले हैं। डियोमेड्स और कुमारगुप्त के दो चाँदी के सिक्के तथा मालवों के 55 ताम्र सिक्के भी मिले हैं।

 

नगर एक योजना के तहत निर्मित था और गणतन्त्रीय शासन के तहत यहाँ घनी आबादी थी। सड़कें और गलियाँ सीधी थीं और भवन व्यवस्थित ढंग से बने थे। कई मंजिले मकान थे, जिनमें सीढ़ियाँ लगी थीं। यहाँ कलाकारों के कारखाने, लौहारों के कारखाने, मृद्भाण्ड पकाने की भट्टियाँ थीं। भवनों में खुला केन्द्रीय कक्ष होता था, जो कमरों से आवृत था। कुषाण काल का एक भवन अच्छी प्रकार संरक्षित है।

 

दीवालें सूर्यातप से पकी ईंटें या जली ईंटों से बनाई जाती थीं जो विभिन्न आकार की होती थीं। नींव झाझड़े पत्थर की बनती थी जो सरलता से नजदीक में प्राप्त था। आँगन मोरंडी मिट्टी के बनते थे, जिस पर अच्छी मिट्टी की तहें कर दी जाती थीं। राख का प्रयोग दीमकों को दूर रखने के लिए किया जाता था। दीवाल के प्लास्टर में भी मोरंडी मिट्टी को काम में लिया जाता था। कीलियों के लिए दीवार में छिद्र रखे जाते थे। छतें मिट्टी के टायलों से छाई जाती थीं।

 

यह स्थान औद्योगिक केन्द्र रहा था, जहाँ कारीगर लोग पकी मिट्टी के बर्तन बनाने में दक्ष थे। कड़े पत्थरों को काटने एवं पॉलिश करने का काम भी यहाँ होता था।

 

मृण्मय मूर्तियाँ हाथ से बनायी जाती थीं, पर साँचे से भी कुछ मूर्तियाँ बनती थीं। हस्त निर्मित मूर्तियाँ उतनी अच्छी नहीं थीं, जितनी साँचे में ढली मूर्तियाँ थीं। इनसे लोगों की पोशाक की जानकारी मिलती है। मृण्मूर्तियों में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ, पुरुष और नारी मूर्तियाँ तथा पशुओं की मूर्तियाँ तथा अन्य वस्तुएँ सम्मिलित थीं।

 

देवी-देवताओं की मृण्मूर्तियों में शिव की डमरु युक्त मूर्ति है, जिसके हाथ में डमरु और गले में सर्पों की माला है। महिष सिर वाली पुरुष मूर्ति है, जिसके हाथ में माला है। यह सम्भवतः महिषासुर है अथवा यम है, जिसकी सवारी भैंसा है। पास खड़े उमा-महेश्वर हैं। देवी दुर्गा महिषासुर का वध करते निर्मित हैं। यह मूर्ति बड़ी कलापूर्ण है। देवों, गणों और यक्षों की मूर्तियाँ हैं। एक गुप्त स्टाइल में उड़ते हुए देव की मूर्ति है।

 

पुरुष और नारी आकृतियों में शकों की, कुषाणों की आकृतियाँ हैं, जो उत्तरी पश्चिमी भारत में बस गये थे। कुषाण स्टाइल में आसीन एक पुरुषाकृति है, स्टूल पर बैठी आकृति है। एक पुरुषाकृति चार तारोंवाली वीणा बजा रही है। इसके मुख का गम्भीर भाव बता रहा है कि यह कोई वेदना भरा गीत गा रहा है।

 

पशु आकृतियों में थूए युक्त बैलों की आकृतियाँ बड़ी संख्या में मिली हैं। सम्भवतः इनकी पूजा की जाती थी। एक पकी मिट्टी के फलक में मानव को हाथी से लड़ता दिखाया गया है। एक त्रिपादिका पर आसीन बन्दर की मूर्ति है। दूसरी में एक बाघ हाथी पर आक्रमण करते दिखाया गया है। इसके ऊपर भाग में जंगली भैंसा और नीचे के भाग में एक सूअर है। घोड़ों, कुत्तों, मुर्गों, कबूतरों, चीलों, सिंहों और भेड़ों की मूर्तियाँ हैं। ऊँट की गर्दन बनायी गई है। एक पक्षी है जिसका उन्नत सिर और पूँछ है पर पैर नहीं है।

 

यहाँ के कारीगरों ने मिट्टी के बर्तन बनाने की कला में दक्षता प्राप्त कर ली थी। ये बर्तन उस अच्छी मिट्टी के बनते थे, जो इस क्षेत्र में बहुतायत से प्राप्त थी। इन पर अलंकरण किया जाता था। कुछ अलंकृत कलश जिनके गर्दन और हैण्डल होते थे, इस प्रकार की डिजायन में तैयार किए जाते थे, जिससे रामायण में आदि गंगावतरण की कथा साकार हो उठती थी। टोंटी और कुछ अन्य भाग अलग से साँचे से तैयार किए जाते थे और कलश के जोड़ दिए जाते थे फिर उसे पक्का लेते थे। ऐसे वर्तन बनाने का एक साँचा भी मिला है। इन टोंटियों के विभिन्न रूप थे। एक झुकी हुई स्त्री, जो अपने हाथों में कलश पकड़े हुए है, एक मकर का सिर जिसके साथ मानव हाथ है, एक सिंह का सिर, एक तोते का सिर, एक लम्बी श्मश्रु युक्त पुरुषाकृति और एक वराह का सिर वाली टोंटियाँ पाई गई हैं।

 

अन्य प्रकार के बर्तनों में प्याले आते हैं। अन्दर का भाग इनका सादा है पर बाहर सुन्दर अलंकरण है। कुछ डिजायनों में अच्छी प्रकार कोरा गया, पूरी तरह खिला हुआ कमल है, जो पैंदे के चारों ओर फैला है और इसके साथ दो पट्टियाँ दूसरी सजावटी डिजाइन की है। कुछ डिजाइनों में आठ गुलाब हैं जिनके साथ एकान्तर रूप से वज्र, हँसिनी और चीते और दूसरे अभिप्राय हैं। मिले हुए त्रिशूलों की पंक्ति और चक्रों के नमूने, फूलदान, टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ और फीते आदि की डिजाइनें हैं। जार के ढक्कन हैं जो गोलाकार तश्तरी के रूप में हैं, जिस पर संकेन्द्रित गुच्छ समूह है और जिसके सिर पर एक लम्बा साँचे में ढला हैण्डल है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस स्थान के निवासी गरीब थे, क्योंकि आभूषण बड़ी कम संख्या में प्राप्त हुए हैं। आभूषण स्वर्ण, ताम्बा, लोहा, सीपी, पत्थर और मिट्टी आदि से निर्मित हैं। एक पतला स्वर्ण का मणिया है ताबीज के रूप में प्रयुक्त होता था। एक स्वर्ण की पत्ती थी जिस पर उभारदार पंखों वाले सिर की छाप लगी थी। यह एक माला के लटकन से सम्बन्धित थी। कई अंगूठियाँ थीं और कर्णफूल थे, जो ताम्बे के बने हुए थे। तांबे के फीते की दो-तीन चरखियाँ थीं, जिनका प्रयोग अलंकरण में होता था। एक मेंढक के आकार वाले श्वेत कांच का मणका था जिस पर विसर्पण के चिह्न थे। एक हरा चमकीला, जो शंख से बने सिंह के आकार का था। एक बारह पार्श्वों वाले पत्थर का मणका भी प्राप्त हुआ था। शंख की दीवार से काटकर बनाए हुए कंगन थे।

 

सेलखड़ी से बनी पटियाँ थीं जो विभिन्न आकार की थीं। कुछ गोल थीं और अन्य वृत्ताकार थीं। बौद्ध स्थलों पर ऐसी पटियाँ पवित्र लोगों के स्मृति चिह्न को सुरक्षित रखने के काम आती थीं। एक सुन्दर आकार वाला कलश था, जो स्पष्ट रूप से शृंगारिक चूर्ण रखने के लिए प्रयुक्त होता था। एक काले सर्प का सिर था जो एक शंख की सीपी के तने से निर्मित था। यह भी शृंगार साधन रखने के लिए था। हाथी दांत के एक कंधे का अंश भी मिला है।

 

लोग यहाँ विविध तरह के धंधे और कारीगरी का काम करते थे। कुम्हार लोग पकी मिट्टी की मूर्तियाँ एवं बर्तन बनाते थे। उनके मुद्‌गर पाये गये हैं, जिन पर नाम खुदे हैं। सुनार विभिन्न तरह के अलंकरण धातु से बनाते थे। लुहार औजार बनाता, हथियार बनाता और लोहे के बर्तन बनाता था। एक लोहे का ट्यूब भी मिला है, जो धौंकनी का मुख प्रतीत होता है। दुधारी तलवारें, दंतली, छैनी और लोहे के टुकड़े लुहार की दुकान से मिले हैं। इसके अतिरिक्त वह बकसुआ, स्टेपल भी तैयार करता था। फिश प्लेट, बंधनी (पट्टी), छल्ले आदि दरवाजे को मजबूत करने के लिए तैयार करता था। दरवाजे की चूलें, रकाब, घोड़े की लगाम, घण्टियाँ, जो जानवरों के गले के बाँध दी जाती थीं, कलछी तेल निकालने के लिए, चमचे, लटकने वाले दीपक और सिलिण्डर के आकार वाला बर्तन तैयार करता था। बड़ी संख्या में तकुआ, चक्कर मिले हैं, जिनसे कताई-बुनाई की बात ज्ञात होती है। ताम्बे की सुईयाँ सिलाई को प्रमाणित करती हैं। मोची, खुरचनी और सूई रखते थे, जो चमड़े को सीने का काम करते थे। एक पत्थर का रोलर और चारपाइयों की तिपाई जो लाल पत्थर की बनी हुई होती थी; मसालों को पीसने के काम आती थी। पीसने की चक्की थी, जिसे भैंसा या बैल घुमाते थे।

 

लोगों का जीवन उदास और सुस्त नहीं था। वे अपना मनोविनोद विभिन्न प्रकार से करते थे। पशुओं की लड़ाई एक दिलचस्प मनोविनोद था। मिट्टी के खिलौने बनाना बच्चों का मनोविनोद था।

 

हैण्डले अपने लेख ‘बुद्धिस्ट रिमेन्स नीयर सांभर’ में इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि प्राचीन टीला एक बौद्ध कस्बे की जगह है, पर साहनी की खोज में प्रमाणित हुआ कि यह एक ब्राह्मणीय स्थल है। ईसा पूर्व दूसरी शती में वैदिक धर्म का पुनर्जीवन की बात एक मिट्टी की मोहर से प्रमाणित है, जिस पर सात छापें हैं। इसके सबसे लम्बे मुख भाग पर एक यूप है, जिसका सिर मुड़ा हुआ है। इस पर प्राकृत भाषा में लेख है जो द्वितीय शती की ब्राह्मी लिपि है। यह लेख इस प्रकार से है, ‘इन्दसमय’ (इन्द्रसरमन)। पांच छोटे फलकों पर ‘मस्तिका’ चिह्न है, जबकि छठा पक्ष या फलक एक त्रिकोणीय नमूना प्रदर्शित करता है, जिसमें पांच अर्गलाएँ हैं। अन्तिम छाप सम्भवतः सीढ़ी की है, जिसके द्वारा यज्ञकर्ता और उसकी पत्नी यूष के सिरे पर चढ़ते थे और प्रार्थना करते थे और पीपल की पत्तियों में लिपटा नमक प्रजापति को भेंट करते थे।

 

देवी और देवताओं की मृण्मूर्तियाँ, रामायण की कथा का अंश (गंगावतरण) साबित करते हैं कि लोग ब्राह्मण धर्म के कट्टर अनुयायी थे, यह बात कुषाण और गुप्त युग पर लागू होती है।

स्रोत
  • पोथी : जयपुर का इतिहास एवं पुरातत्व ,
  • सिरजक : अज्ञात ,
  • प्रकाशक : राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी ,
  • संस्करण : द्वितीय संस्करण
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