पुरातत्त्व विज्ञान का महत्त्व आज सर्वविदित है। पुरातात्त्विक अध्ययनों से हजारों वर्ष पूर्व के खण्डहरों में दफन संस्कृतियों को उत्खनित करके प्रशंसनीय कार्य किया है। मानव के विभिन्न उपकरणों, औजारों तथा उसकी अन्य उपयोगी सामग्री जो भूमि में एक अन्तराल से प्रकृति और जलवायु से सुरक्षित है, उनके अध्ययन से अतीत के विभिन्न चरणों के विकास का वैज्ञानिक पुरातत्त्व ही करता है। ऐसे अनेक स्थान जयपुर क्षेत्र में अवस्थित हैं, जिनके गर्भ में पुरातत्त्वीय सम्पदा छिपी पड़ी है। नगर भी इसी प्रकार एक प्राचीन स्थल है।
नगर कस्बा जयपुर जिले के उणियारा कस्बे से दक्षिण-पश्चिम में 24 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ है। यह एक किलेबन्दी युक्त लघु कस्बा है, जो कुछ-कुछ उजड़ी स्थिति में है। यह एक प्राचीन स्थल है जो छः वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस स्थल की प्राचीनता के द्योतक स्मृति चिह्न एवं भवनादि हैं। साथ ही आहत एवं मालव मुद्राएँ हैं, जो बड़ी संख्या में यहाँ से प्राप्त हुई हैं। ये मुद्राएँ इसकी प्राचीनता की कथा कहती हैं।
नगर मालव गणतंत्र की गौरवशालिनी राजधानी रहा है। मालवों के पतन के पश्चात् भी यह स्थान 10 शती ईसवी तक मालव नगर के नाम से विख्यात रहा है। मालव लोग शक्ति सम्पन्न थे। उनके संघर्ष अजमेर के अपने पड़ोसी उतमभद्राओं से हुआ था। साथ ही उनके सहायक क्षहरात शकों से जो पश्चिम भाग में अवस्थित थे, से भी मालव लोगों का युद्ध हुआ था। ये संघर्ष ईसा की दूसरी शती के आस-पास के काल में हुए थे। कुछ समय तक इन मालवों को पश्चिमी क्षत्रपों तथा कुषाणों की प्रभुसत्ता भी स्वीकार करनी पड़ी थी। आगे चलकर वे विद्रोही हो उठे। इन्होंने एक सहसत्रिरात्र यज्ञ 226 ई. में सम्पन्न किया था, जिसमें अपनी स्वतन्त्र होने की घोषणा की थी। आल्तेकर ने इनके नेता का नाम ‘श्रीसोम’ पढ़ा था जबकि रामय्या ने इसे ‘नंदी सोम’ माना था। इस समय से मालव गणतन्त्र की खूब उन्नति हुई। वि. 264 के एक शिलालेख से ज्ञात होता है कि अहि शर्मा ने एक यज्ञयूप का संस्थापन किया था। यह अहि शर्मा धरक का पुत्र था जो एक अग्निहोत्री ब्राह्मण था। इससे ज्ञात होता है कि राजस्थान के इस भू-भाग में तीसरी शती में वैदिक यज्ञों की परम्परा पुनर्जीवित हो उठी थी।
बाड़वा स्तम्भ लेख से ज्ञात होता है कि मौखरी लोगों ने 239 ई. में यहां एक यज्ञ सम्पन्न किया था। ऐसा प्रतीत होता है कि ये मौखरी लोग मालवों के अधीन हो गए थे। नगर स्थान से छः हजार मालव सिक्के प्राप्त हुए हैं। इनकी तिथि के बारे में विद्वानों ने मतभेद है। कार्लाइल और कनिंघम ने इनकी तिथि 200 और 350 ई. के बीच बतायी है जबकि स्मिथ के अनुसार प्रारम्भिक तिथि 150 ई. पूर्व से पहले की नहीं है।
अल्लन के अनुसार ये सिक्के दूसरी शत्ती ई. और चतुर्थ शती के पूर्व भाग से सम्बन्धित है। इन सिक्कों पर ‘मालवानांजयः’ या ‘मालवगणस्यजयः’ लेख लिखित है। इन सिक्कों पर कलश, सिंह, सांड, राजसिर, मोर आदि पृष्ठ भाग में अंकित है। कुछ अन्य सिक्के भी मालव सिक्कों के साथ प्राप्त हुए हैं और बनावट में उनसे सादृश्य रखते हैं। कुछ पर लेख नहीं है तथा कुछ पर अर्थहीन लेख अंकित हैं।
स्मिथ ने भारतीय सिक्कों में मालव सिक्कों को एक विशिष्टता से युक्त बताया है। इसका कारण इनका कम वजनी होना और आकार में छोटा होने के साथ-साथ अर्थहीन लेख से युक्त होना भी है। कल्याण कुमारदास गुप्त का अभिमत है कि ये सिक्के उन मालव मुखियाओं के हैं जो अनार्यवंश से सम्बन्धित थे।
नगर को बहुधा कर्कोटक नगर भी कहा जाता रहा है। इससे यह निष्कर्ष स्वाभाविक है कि कभी इस पर नाग कुल का अधिकार रहा है। मालव लोग पद्मावती के नागों के समकालीन हैं, अतः इस मान्यता को बल मिलता है।
नगर में हुए उत्खनन से कई महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं। इनमें एक यह है कि 10वीं शती तक यह नगर बसा रहा पर इसका वैभव काल द्वितीय शती से चौथी शती विक्रमी तक रहा है। यह बात इसकी नगर योजना की श्रेष्ठता से जानी जाती है। यहाँ उत्खनन में सुन्दर मृण्मय महिषमर्दिनी, इन्द्र-इन्द्राणी, चतुर्भुज, विष्णु, कामदेव आदि की मूर्तियाँ मिली हैं, जो कला की उच्चता की प्रतीक हैं।
यहाँ खुदाई में सिक्कों के अतिरिक्त तांबे, सोने और कीमती पत्थर की वस्तुएँ भी प्राप्त हुई हैं, जिनसे नगर की समृद्धि की बात ज्ञात होती है। तांबे की अंगूठियाँ और पिनें मिली है। विभिन्न आकार के मणके और कीमती पत्थर से निर्मित आभूषण, खासतौर से गोमेद पत्थर से निर्मित गहने, चट्टान एवं बिल्लौरी पत्थर से निर्मित आभूषण, तामड़े निर्मित आभूषण एवं जम्बूमणि मिले हैं। तांबे के विभिन्न वजनी बाट कीमती पत्थरों को तोलने हेतु थे। हाथी दांत के बने भुजबंद और पायलें उत्खनन में प्राप्त हुई हैं। ये खण्डित रूप से मिली हैं। इससे ज्ञात होता है कि स्वर्णकार, लुहार एवं जौहरियों के यहाँ निवास थे।
यह धारणा प्रचलित है कि इन मालवों का विनाश राज्य विस्तार की नीति पर चलने वाले गुप्त सम्राटों द्वारा हुआ। मालवों ने आगे चलकर समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार कर ली थी। चन्द्रगुप्त द्वितीय तथा कुमारगुप्त प्रथम के काल तक वे अधीनस्थ जीवन बिताते रहे थे। 5वीं शती के हूण आक्रमणों से भी वे क्षतिग्रस्त हुए थे। उत्खनन से मानव अस्थियाँ, राख और भवनों के भग्नांश मिले हैं जिससे ज्ञात होता है कि यह नगर किसी आकस्मिक विपत्ति का शिकार हुआ था।
आगे चलकर चाटसू के गुहिल लोगों के काल में 7वीं शती में नगर की समृद्धि फिर लौटी। यह उनके अधीन 10वीं शती तक रहा। 684 ई. में गुहिल शासक धनिक ने शंकर के अभिषेक हेतु एक बावड़ी का निर्माण करवाया। इसे भिल्लमाल के सूत्रधार गृहभट्ट के पुत्रों ने बनाया। इससे नगर की समृद्धि की बात ज्ञात होती है।
मण्ड किला ताल शिलालेख से जो 1043 विक्रमी का है, इस नगर की समृद्धि की बात ज्ञात होती है, जो दसवीं शती तक बनी रही। डॉ. डी.सी. सरकार ने ‘मालवाख्य’ शब्द का अर्थ मालव नगर लिखा है, क्योंकि शिलालेख यहीं से प्राप्त हुआ है। इस समय के एक ब्राह्मण का नाम आया है, जो इन्द्रशर्मन है। कवि मिलमति भी इसी नगर में आकर बस गए थे।
नगर में अनेक मन्दिर और भवन थे। नागहरि ने पूर्वाभिमुख एक विष्णु मन्दिर बनाया था, जिसमें विष्णु की मूर्ति विराजमान थी। यह मन्दिर वैद्य तड़ाग के किनारे बना था। परिवार के अन्य लोगों ने भी उच्च देव भवनों का निर्माण करवाया था। इसी परिवार के नन्दन ने एक मन्दिर तीन देवों- हरि, शंकर नारायण और सूर्य को समर्पित किया था। इस नंदन के छः पुत्र थे।
पुरातात्त्विक अवशेषों से ज्ञात होता है कि यह नगर प्रारम्भिक मध्यकाल तक समृद्ध बना रहा। उस समय के कुछ मन्दिर आज भी विद्यमान हैं। प्राचीन वीरम का देवरा 10वीं शती में बना था। मध्यकाल में बने कुछ और मन्दिर भी यहाँ विद्यमान हैं। मूर्तियों के अवशेष खुदाई में प्राप्त हुए हैं। इनमें एक वराह का शिर मिला है। दूसरा अवशेष जैन मन्दिर का है। शिव-पार्वती बैल पर आसीन मूर्तियों के अवशेष भी मिले हैं। मच्छकंडा का प्राचीन मन्दिर है, जो पूर्वकाल में बना विष्णु मन्दिर है। 5 तटबंध युक्त जलाशय नगर के चारों ओर थे जिनसे पानी की कमी नहीं रहती थी। पहला बंचौरा बंध और दूसरा दतौर सागर के नाम से जाना जाता है। तीसरा मंड किला ताल कहलाता है। एक प्राचीन बावड़ी जो दीर्घ पत्थरों से निर्मित थी, के अवशेष भी मिले हैं।
नगर की खुदाई में एक हजार से अधिक पात्रों के टुकड़े तथा लगभग 500 अन्य छोटे-छोटे अवशेष यहाँ से खुदाई में प्राप्त हुए हैं। यहाँ के मृद्भाण्डों के अवशेष लाल रंग के थे। कुछ मृद्भाण्ड सलेटी रंग के भी मिले हैं। उंगली से डिजाइन बनाए गए अन्न भरने के मटके मिले हैं। इन पर चिकनाहट के साथ-साथ अलंकृत कलात्मक नमूने भी हैं। ऐसे अलंकरण हाथ की अंगुलियों से बनाए जाते थे। यहाँ एक गोल पैंदे का चौड़े मुख वाला मृद्भाण्ड खुदाई में मिला था, जिसके बैठकीदार घेरा था।
पात्रों की मिट्टी लाल, गुलाबी व भूरी थी और पानी को सोखने वाली थी। सलेटी रंग के पात्र अधपके थे। छिड़काव के लिए छिद्र युक्त पात्र एवं टोंटी वाले पात्र भी बड़ी संख्या में मिले हैं। इन पात्रों में धूपदान, हत्थेदार सुराही, लोटे, टूंटीदार प्याले आदि उल्लेखनीय हैं। यह पात्र सामग्री गुप्तकालीन है। सफेद खड़िया के बने पात्र भी पर्याप्त संख्या में मिले हैं। इनमें से कुछ पर मानव एवं पशु आकृतियाँ, रेखा और रंगयुक्त चित्र, छापों द्वारा आलेखन, कुछ पर आलेख खुदे हुए एवं कुछ पर उभरे हुए हैं। मकराकृति वाली टोंटियों भी खुदाई में मिली हैं।
इन पात्रों के अलावा ईंटें और उनके टुकड़े भी प्राप्त हुए हैं। यह ईंट आकार में 3 से 13.5 x 9” x 2.25” से 2.52” की हैं। कुछ प्रतिमाएँ भी यहाँ से मिली हैं। एक प्रतिमावशेष पर कमल पर किसी देवता का पैर स्थापित है। एक अवशेष पर गणेश का अंकन है, जो बहुत सुन्दर है। गणेश के दाहिने हाथ में पाश और बाएँ में मोदक है। दुर्गा का एक अवशेष पर अंकन है। लक्ष्मी की एक खड़ी प्रतिमा भी प्राप्त हुई है। ये कलाकृतियाँ गुप्तोत्तरकालीन हैं।
कुछ अस्पष्ट लेखों का अंकन भी पात्रों पर किया गया मिला है। दो मिट्टी की थालियों पर लेख मिले हैं, जो सम्भवतः कुम्हारों के नाम हैं। इनकी लिपि गुप्तकालीन ब्राह्मी है। यहाँ पर देव और रत्ति की खण्डित मृण्मय मूर्तियाँ मिली हैं। एक शोक संतप्त मुद्रा में मानव मुख भी मिला है। इन सब वस्तुओं से ज्ञात होता है कि नगर मालवों का प्रमुख नगर रहा है।
नगर के उत्खनन से एक विकसित सभ्यता की जानकारी मिली है। यह यूनानी लेखकों की मल्लोई तथा महाभारत के मालवों की राजधानी है। उत्खनन से यहाँ विविध कलात्मक वस्तुएँ, आभूषण, लौह उपकरण, मृद्भाण्ड, मुद्राएँ तथा विभिन्न प्रकार की मृण्मूर्तियाँ मिली हैं। कुछ सिक्कों पर विचित्र और अधूरे लेख जैसे गजब, गोजर, जमक, जमपय, मगछ, मगज, मगजस, मगोजय, मजुप, मपक, मप्रोजय, मरस, माशय, पछ, पय, यम आदि अंकित हैं। इनके अर्थ में एकमत्य नहीं हैं। नगर की खुदाई कृष्णदेव की देख-रेख में हुई थी। यहाँ से उपलब्ध सामग्री पुरातत्त्व संग्रहालय आमेर में सुरक्षित हैं।