चायै कोई छोटा-सा देवरा नै धोकबा जावौ, चायै बडा सूं बडा मिंदर में जावौ, जे वठा संगमरमर में तरास्योड़ी सफेद मूरती है तो वा जैपर रा मूरतकारां री उकेर्योड़ी ई व्हैसी। राजस्थान ई नईं, पूरा देस में उत्तर सूं लेय’र दक्खिण तांई अर पूरब सूं लेय’र पच्छिम तक संगमरमर री मूरती, जाणकार लोग जाणै क, जैपर सूं ई गयोड़ी है। बिलायत में भी जठा भी हिंदू मिंदर है, वठा जैपुर रै अलावा और कठा स ई गयोड़ी मूरती नीं व्हे सकै।
पतौ नीं भगत लोग आपरा आराध्य नै धोक देवै के वां नै उकेरण हाळा कलाकारां नै! जैपुर में मूरती उकेरण हाळा करीब 5000 कलाकारां रौ मोहल्लौ सुबै सूं लेय’र शाम तक मूरती गढबा रौ काम करै। ईं काम ई खातर चांदपोळ बाजार में ‘खजाना का रास्ता’ अर ‘भिण्या का रास्ता’ में अर आं रै आसै-पासै बस्योड़ा मूरती कलाकारां रै कारण ईं जगा रौ नांव ई ‘मूरती मोहल्लौ’ पड़ग्यौ। पैली ईं नै सिलावटां रौ मोहल्लौ कैया करता। स्यात वीं जमाना में इमारती काम अठा ज्यादा व्हेतौ व्हैसी। अब तो इमारती काम करण हाळा गिण्याचुण्या ई है। मूरतकार ज्यादा व्हेबा सूं खुद काम करण हाळा अर दूसरा लोग ई ईं नै मूरती-मोहल्लौ कैवण लागग्या। ईं खातर यो मूरती-मोहल्लौ ई बाजण लागग्यौ।
आप ई मोहल्ला में जावौ तो कदै-कदै कोई भी पूछ सकै क—“सा, कांई चाइजै? आवौ!” पण असी बातां ब्यौपारी ई करै। कलाकारां नै तो माथौ ऊंचौ करबा री फुरसत ई कोनीं। काम करता-करता थाक जावै तो वे के तो पान खाबा वास्तै चल्या जावै के चाय पीबा खातर रवाना व्हे जावै। अर ज्यादा ई फुरसत मिल जावै तो ‘पिक्चर’ में चल्या जावै। दो-चार कलाकारां नै कोई चाय री दुकान जचगी तो समझौ वा दुकान जमगी। अब वीं दुकान री चाय पीबा खातर चायै चार चौरायं दूर ई क्यूं नईं जाणूं पड़ै। पान री दुकान री भी या ई हालत है। कोई सा सिनिमा हाल रा कोई सा ‘शो’ में देख आवौ, दो-चार मूरतकार तो हर सिनिमा घर में बड़ता-निकळता मिल जासी, पिछाणनू कोई मुस्किल काम कोनीं। ज्यादातर तो अे सफेद कपड़ां में व्हैसी। फेर पगां में चप्पल ई व्हैसी। चप्पल अर पगां री आंगळ्यां में संगमरमर री झींकी री सफेद लाग्योड़ी दूर सूं ई दीख जावै तो जाणल्यौ के अे मूरतकार है।
मोहल्ला री बात सुरू कर्यां पैली-अठा वास्तै अलग-अलग तरै रौ पत्थर ज्यो आवै, वीं रौ भी लंबौ किस्सौ है। सफेद पत्थर रै वास्तै तो मकराणौ ई मशहूर है। मकराणा में भी अलग-अलग खान्यां सूं अलग-अलग जात रौ पत्थर निकळै। मकराणौ रेलवे स्टेसण है। वण सूं चालां तो सै सूं पैली डूंगरी री गुणावती खान आवै। ईं खान रौ पत्थर कुछ लीलास लियोड़ौ निकळै। मकराणा सूं 2 किलोमीटर दूर फाडकूवा सूं बढिया संगमरमर निकळै—बिलकुल सफेद। फेर माताभर री खान। स्यात् अठै माताजी रौ मिंदर होवा सूं खान रौ नाव माताभर पड़्यौ। ईं खान सूं निकळ्योड़ौ पत्थर थोड़ौ सख्त व्है है। बोराबड़ री खान सूं गुलाबी पत्थर निकळै। ईं पत्थर सूं जैन मुड्यां खूब बणै। जैपर-दिल्ली रोड पर भैंसलाना री खान्यां आवै। जैपर-दिल्ली रोड भ भैंसलाना री खान्या आवै। अठा रौ पत्थर काळौ व्है। काम करबा में थोड़ौ सख्त भी व्है है। ईं पत्थर सूं शनि देव री मूरत, शिवलिंग पिंडी, जळेरी, श्याम रूप किसण वगैरा री मूरत ज्यो भी काळै रंग री व्हेणी चाइजै, वा घड़ी जावै।
मकराणा सूं ताजमहल बण्यौ, कलकत्ता रौ विक्टोरिया मेमोरियल बण्यौ, अर बिहार री पावापुरी में भगवान महावीर रौ निरवाण-थळ बण्यौ। आगरा में दौलतबाग आज भी बण रैयौ है। भारतीय वास्तुशास्त्र रै अनुरूप अब बणवा हाळा बिड़ला मिंदर, ज्यां में मद्रास अर जैपर रौ नांव लियौ जा सकै, वे भी संगमरमर रा ई बणै है। कलकत्ता में बण्यौ मेमोरियल पत्थर निकाळबा खातर मकराणां में मशीनां लगवाय दियौ। बीं जमाना में कोई मार्टिनी कंपनी पत्थर सप्लाई रौ ठेकौ लियौ हौ। सन 1935 ई. में जद काम पूरौ व्हेग्यौ तो कंपनी आपरौ माल असबाब नीलाम कर देस चलीगी। वे मशीनां चार ब्यौपारी खरीदी। जद सूं ई पत्थर तेजी सूं निकळबा लागग्यौ अर खान्यां रौ ओड़ ले लियौ।
धीरै-धीरै बडी-बडी होटलां भी फैशन रा चक्कर में फर्श, बाथरूम आद जगावां पर मारबल लगाबौ सुरू कर्यौ तो ज्यो पत्थर मूरत खातर काम आणू चाइजै हौ, वो फर्शी काम आबा लागग्यौ। नतीजौ सामनै आयग्यौ। पत्थर मैंगौ व्हैग्यौ। ब्यौपार्यां नै फर्शी में फायदौ घणू, सो मूरतकारां री हालत खराब व्हेयगी। मूंडै मांग्या पीसा देणा पड़े फेर भी ठीक पत्थर मिल जावै—ईं री कोई गारंटी कोनी। आज हालत या व्हैगी है क ग्रायक कोई बडी मूरत रौ आडर देबा नै जावै तो कलाकार पैली पत्थर रौ जोड़-तोड़ देखै, फेर आडर लेवै, नींतर साफ मना ई कर देवै।
पुराणा जमाना सूं मूरत कोरबा रौ काम चलतौ आ रैयो है। जगा-जगा रा कलाकार आपरै आस-पास मिलबा हाळा पत्थर नै ई मूरत खातर काम में लेवता। जैपर रै कोई अस्यौ पत्थर कोनीं हौ, पण मकराणा भी अस्या काम खातर ज्यादा दूर कोनीं। वयां इमारती काम खातर अलवर रै कनै झिरी अर रायला रौ पत्थर मिलतौ।
बीं पर खूब काम व्हियौ है। अब मकराणू चुकग्यौ। खान्यां गैरी व्हेती जा रैयी है। अेक तरा सूं कूवा-सा व्हेग्या है। पाणी भी भरग्यौ है। वयां तौ खान्यां हाळा नै पत्थर काटबा री मशीन खातर पाणी दूर-दूर सूं मंगाणू पड़ै अर वयां खान्यां में पाणी मांकळौ भर्यौ, काडबा रौ ई सांग! पत्थर री ई कमी रै कारण ई अब आबू अर उदैपुर कानी रौ पत्थर भी काम में लेबा लागग्या। यां पत्थरां में वसी सफेदी अर आब कोनीं व्है। कुछेक बरसां पाछै यां में पीळौपणू भी आबा लाग जावै।
मोहल्ला में मूरतकारां री लंबी अर सांतरी परंपरा है। सवाई जैसिह जद सन 1727 ईं. में जैपर बसायौ तौ आमेर सूं मंज्योड़ा कारीगरां नै जैपर आवणू ई हौ। आमेर रा खंडहर ई बात रौ पक्कौ सबूत है के बठै भी मूरतकार लंबा जमाना सूं जम्योड़ा हा अर लगतमार काम करबा सूं अेक खास शैली अर पिछाण वे लोग बणा लीनी ही। आमेर में ग्यारवीं सदी तक का मिंदर-देवरा बण्योड़ा आज भी देख्या जा सकै। जैपर बसबौ सुरू हुयौ तो सिलावट भी आपरौ काम चल्लू कर दियौ। वीं जमाना में बण्योड़ा म्हैल, मिंदर छतर्यां अर हवेल्यां में पत्थर में व्हियौ काम जैपर में ई हुयौ। काम ज्यादा होबा लाग्यौ तो लोग बारै सूं भी आबा लागग्या। अयां धीरै-धीरै जैपर पुजग्यौ।
पैली यो काम करबा हाळां नै सिलावट कैबौ करता, पण अब ये लोग खुद नै मूरतकार ई कैवाबौ चावै है। अब मोहल्ला में सिलावट कम अर मूरतकार ज्यादा है। जमाना रै साथ-साथ मूरत बणाबा री भांत भी बदळगी। पैली मूरत्यां असी बणती क ज्यां नै पोशाक पैराय’र सजायी जा सकतौ हौ। जेवर भी हैसियत गैल ऊपर सूं पैराया जाता हा। जेवर भी हैसियत गैल ऊपर सूं पैराया जाता हा। धीरै-धीरै जमाना में फैशन चाली तो फिलमा रै कारण बंबई री फौशन रौ जोर व्हेगौ। सरूआत कलेण्डरां सूं हुई। वे कलेण्डर जद जैपर पूंच्या तो लोगां नै बे ई चोखा लागबा लाग्या। मूरत्यां में वां री नकल होबा लागगी अर पाछै धीरै-धीरै पुराणू फैशन गायब होबा लागग्यौ अर डिजाइन में सब तरफ नया फैशन की मूरत्यां की भरमार व्हेयगी। पुराणी चाल री मूरत्यां अब मैंगी मिलबा लागगी।
कलाकारां री अेक लंबी परंपरा मोहल्ला में मौजूद है। वे लोग ज्यां रौ काम आज भी देख्यौ जा सकै अर ज्यो सरगवासी व्हेग्या, वां में उस्ताद माळीरामजी रौ नांव सै सूं, पैली लेणू पड़ै। माळीरामजी जैपर रा माइकल-अेन्जेलो हा। ज्यो देखता वो वस्यौ रौ वस्यौ ई बणा देता। याददास्त रै साथ हूबहू चीज बण देणी अर वीं में कल्पना रौ पुट भी दे देणूं वां री खासियत ही। वे सात ब्याव कर्या, अेत संतान व्ही पण वा भी ज्यादा कोनीं जीवी। अब वां रौ दोयतौ घर रौ मालिक है, अर काम भी वो बढिया करै। नारायण लालजी जैमिनी आपरा सवा लाख रा हाथी खातर ज्यादा मशहूर व्हिया। अब जबलपुर में स्थापित राणी दुर्गावती काळा हाथी पर हौदा समेत सफेद संगमरमर में उकेरी गई ही। या आदम कद मूरत ई छी, जीं में हाथी टुकड़ा-टुकड़ा कर जोड़कर खड़ौ कर्यौ गयौ छौ। हीरालाल शर्मा 10 बरस री उमर रै आस-पास परलोकवासी हुया। वे मूरती बणाबा का माहिर कलाकार छा। गाळी गाबा रा खास शौकीन हीरालालजी री बणायी हुई तिलक री मूरती आज भी वां रै घरां देखी जा सकै। पुराणा जमाना में कच्चा माडल घीया पत्थर में कोर्या जाता ज्यां नै दिखाय’र आडर पास करायौ जातौ। हीरालालजी रा कोर्योड़ा अस्या कइ माडल देख्या जा सकै ज्यां में बस प्राणां री ई कमी लागै। गुलाबचंद शर्मा आर्ट स्कूल में मास्टर भी हा, वे भी खयाली मूरत्यां खूब घड़ी अर खासौ बढिया काम कर्यौ। रामरतन मिश्रा जवानी में ई शांत व्हेयग्या। बे बंबई में कला री शिक्षा लीनी अर यथार्थवादी काम खूब बढिया कर्यौ। अब 65 बरस री उमर पार कर्योड़ा अर कोई 80 बरस तक भी पूचग्या कलाकारां, ज्यां रा काम में दम है, में लल्लूनारायण शर्मा, गोपीचंद मिश्रा, भौरीलाल, नारायणलाल तिवाड़ी, गणेशनारायण, बाबूलाल भारद्वाज, जानकीलाल, रामेश्वरलाल, शिवनारायण लाल जैमिनी, मूळचंद कल्याणचंद, सुंदरलाल, रामकिशन, लूणकरण आद खास है।
आधुनिक कला में पुनर्जागरण रौ जमानू आयौ जद अंगरेजी अर विदेसी सारी चीजां ने ई छोडबा री कोसिस चल्लू हुई। शांति निकेतन सूं या सुरूआत हुई तो वठा रा पढ्योड़ा कलाकार देस में अठी-बठी नै जमग्या। जैपर में बंगाली लोगां री मानता ज्यादा छी। आर्ट स्कूल में भी बंगाली मास्टर अर प्रिंसीपल आया। यां में ‘लाहौर स्कूल ऑफ आर्ट’ में पढ्योड़ा कलाकार टी.पी. मित्रा नै वीं वखत रा प्राचार्य हिरण्मयराय चौधरी खास तौर सूं जैपर बुलाया। मित्राजी ताउमर कंवारा ई रैया। वे आर्ट स्कूल में मूरती कला ज्यो चाल रैयी ही, वीं में माटी-कला रौ काम और जोड़ दियौ। ई सूं पैली कच्चा माडल धीया पत्थर में बणता, वे अब माटी में आसानी सूं बणबा लागग्या। ग्रायक नै कोई फेरबदळी कराणी व्हेती तो वो सामनै ई बैठ’र आपरी मरजी रै मुताबिक तब्दीली कराय’र माडल पास कर देता। ई क्लास में मूरती-मोहल्ला रा विद्यार्थी भी आया अर वे या तकनीक सीख’र आपरा काम में अेक ताजगी-सी पैदा करवा री सफळ कोसिस करी। मित्राजी अब कोनीं रैया, पण वां रा शिष्यां री अेक लंबी परंपरा है ज्यो ईं खेत्र में आपरौ खासौ नांव कमायौ है। ईं स्कूल सूं आधुनिक मूरती कला भी पनपी। हाल री ई बात ई आर्ट स्कूल में पढबा वाळा विद्यार्थी नरेश भारद्वाज नै आधुनिक मूरती कला खातर राष्ट्रीय कला पुरस्कार मिल्यौ। यो पुरस्कार राजस्थान में पैली बार आयौ है।
ठेठ रुजगार री जयां काम करबा हाळा यां कलाकारां की आपरी खुद री गढ्योढ़ी हैं। सै भगवान में श्रद्धा राखै, पण वांनै आपरी बोलचाल री भाषा में जीकरौ कोनी देवै। मूरती नै नग कैवै। वां रा नांव भी अजीब-अजीब। चार सूं छै इंच नाप री मूरती ‘चुटकुला’, डेढ फुट रौ नग ‘कौडी’ अेक फुट रौ नग ‘औखडौ’, नौ सूं दस इंच रा नग ‘पचखंडा’, सात इंच रा ‘रिलीफ’ नग ‘चपटा’ आठ इंच रा नग ‘ग्याराना’, खड़ा नग ‘चौदाना’ वगैरा नांव दे राख्या है। अलग-अलग नाप रा हणमान, महादेव राम जोड़ी, कुष्ण जोड़ी. जळेरी, पिंडी आद और नांव है ज्यां हौ परिचय देबा री जरूरत कीनीं। फोटू री मूरत्यां में आधी मूरती नै ‘बस्ट’ अर पूरी नै ‘स्टेच्यू’ बोल्यौ जावै। वे मूरत्यां ज्यां रा हाथ-पग बिलकुल खुल्ला व्है वांरै कोई लाग नीं व्है, ‘निर्गम’ अर ज्यां रा हाथ, कपड़ा वगैरा पाछा सूं कोई पत्थर की पट्टी या लाग सूं जुड़्या व्है, वे बादरादारी मूरत्यां बाली जावै। जैन मूरत्यां नै मुढ्ढी कैयौ जावै।
जीविका री नजर सूं देख्यौ जावै तो अेक कलाकार अठा पचास रुपिया रोज औसतन कमाय लेवै है ज्यो आज रा जमाना में मामूली ई बात है। मोहल्ला में कुल पांच हजार कलाकार ब्हैसी। मूरतकारां रै साथ हळकौ काम करबा हाळा सिलावट ज्यो ज्यादातर मुसळमान ई छै, वे भी करीब पांच सौ व्हैसी। पत्थर लै सरिया लगा’र तोड़बा हाळा लोग हरिजन व्है है। मूरत्यां नै अेक जगा सूं दूसरी जगा ले जाबा वास्तै ढेली मजदूर अर पलदार भी ईं धधा रै साथ सुबै सूं शाम तलक लाग्योड़ा रैवै। मूरत्यां री कीमत 20 रुप्यां सूं सुरू करां तो आगै कठै तक भी पूंच्यौ जा सकै है। जैमिनीजी हाथी पंदरा बरस पैली सवा लाख रुप्यां में बणायौ छौ जीं में भी वांनै घाटौ ई लाग्यौ। ईं टाइम रै आस-पास ई जैपर रा स्टेच्यू सर्कल पर जैसिंहजी री 12 फुट ऊंची मूरती साठ हजार रुप्यां में बणी ही। आज रा हिसाब सूं तो यां कीमतां नै दूणी करल्यौ तो भी कम हैं। पण रोजीना बणता छोटा-छोटा देवरा, बडा मिंदर, नेता, साधू-महात्मा, घर रा बडा-बूढा सै ई मूरती रा ईं उद्योग नै पणपाबा में खास ‘रोल’ राखै है। सै सूं ज्यादा आसरौ तो धरम रौ ई है आस्था, श्रद्धा अर विस्वास रौ है। यै नईं रैवै तो मूरत्यां बणबा ई बंद व्हे जावै। व्यवसाय अर धरम नै अेक कानी राखौ तो या कला परंपरा है ज्यो गै आबा हाळा हजारां बरसां पाछै भी आपरौ इतिहास राखसी। तडका नै जैपर रैवै—नईं रैवै, कलाकारां नै तो आपरी ऊमर पूरी कर जावणू ई है। नया आ जासी पण यै मूरत्यां अर यां नै घड़बा हाळा कलाकार हमेसां जाण्या जासी।
राजस्थान में मूरतकला रौ इतिहास 10-11 वीं सदी सूं उपलब्ध है। प्राचीन तथ्यां कानी ध्यान देवां तो शुंग, कुषाण अर गुप्त काल तांई की मूरतकला रा प्रमाण अठै मौजूद है। जैपुर री बात करां तो जिण वखत सवाई जयसिंह आपरी नुंवी राजधानी री कलप्ना करी तो आमेर सूं चित्रामकार, मूरतकार अर दस्तकार आय आयनै जैपुर में डेरा जमाया। मानसिंह अकबर रै वखत मे आमेर रौ जगत प्रसिद्ध मंदिर बणावणौ सरू कियौ हो। इण में सफेद अर लाल पत्थर रौ आछौ उपयोग हो। समकालीन आमेर रा राजावां री छतरियां माथै ई आछौ काम हुयौ। मूरत कला री आ परंपरा जैपुर में घणी जूनी है।