लालसोट दौसा के पास अवस्थित है। यह प्राचीन काल में बौद्धों की बस्ती रहा। यहाँ से शुंगकालीन बौद्ध स्तूप के अवशेष प्राप्त हुए हैं। दौसा जिले में लालसोट के बाहर एवं स्थानिक डाक बंगले के पास बंजारे की जीर्ण-शीर्ण छतरी में लाल पत्थर के बने 6 स्तम्भ लगे हैं, जो साँची एवं भरहुत की कला का स्मरण करा देते हैं। यहाँ स्तम्भों पर बनी पुरुषाकृतियाँ, कमल, स्तम्भ स्तूप आकृति आदि उल्लेखनीय हैं। इन स्तम्भों के दोनों ओर उत्कीर्ण अंश सूची स्तम्भ लगाने के काम आते थे। लालसोट की छतरी के स्तम्भी शुंगकालीन बौद्ध स्तूप के बाहर परकोटे के रूप में प्रयुक्त रहे होंगे। इनसे ज्ञात होता है कि लालसोट में कभी एक बौद्ध स्तूप था जो कालान्तर में गिर गया था या नष्ट कर दिया गया। उसके अवशेष इधर-उधर पड़े रहे। जब बंजारे की छतरी बनी तो इधर-उधर पड़े इन स्तम्भों को उसमें लगा दिया गया।

 

यहाँ पास ही में भण्डारेज में ग्राम के टीले पर बौद्ध स्तूप शिलाओं के अवशेष मिले हैं, जो ईसा की प्रारम्भिक शती के हैं। कालक्रम की दृष्टि से लालसोट की सामग्री के बाद के हैं। लालसोट भाण्डारेज क्षेत्र में बौद्ध कला बड़ी विकसित थी। लालसोट के स्तम्भ भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित कर दिये गये हैं।

 

लालसोट, भाण्डारेज एवं गढ़मोरा आदि का क्षेत्र मध्यकाल में चौहानों का प्रदेश रहा है। चौहानों के कई कुलों ने यहाँ पर दीर्घ अवधि तक शासन किया। जिस समय कछवाहा दूल्हराय इधर यहाँ आये, उस समय लालसोट पर काल्हणसी चौहान का अधिकार था। इन्हीं चौहानों की मदद से दूलहराय ने बड़गूजरों और मीणों पर विजय प्राप्त की थी। आगे चलकर यह भू-भाग कछवाहों के अधिकार में चला गया।

स्रोत
  • पोथी : जयपुर का इतिहास एवं पुरातत्व ,
  • सिरजक : अज्ञात ,
  • प्रकाशक : राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी ,
  • संस्करण : द्वितीय संस्करण
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