वैश्वीकरण रै पछै आपणा गांव 'ग्लोबल' बणग्या। जिंदगी रै हरेक पख में टेकनीक आयगी। और तो और आजकाल रो आदमी भी 'हाइटैक' हुयग्यो। रसोई रै खूणै-कचूणै में ही मीडिया बड़ग्यो। जकी राबड़ी, डोवो, गुज्जी अर बरड़क बाटी बणावणी दादी रै अनुभव अर खुद री खेचळ सूं सीखीजती, बा अब्बै एल.ई.डी. में दीखती मेडमां बतावै। बगत रो बदळाव हुयग्यो। माळा-मिणियांळी कोथळी में मोबाइल बड़ग्यो। पाघड़ी री जिग्यां रूमाल अर धोती-मौजड़ी री जिग्यां पेंट अर सैंडल लेयली। देखतां ही देखतां फेसबुक, ट्वीटर, औरकुट, लिंक्डिन जैड़ा हथाई करण रा राछ बापरग्या। बाजोट, चौपड़ा, ढेरिया, मांचा अर ढोलिया अड़ाभीड़ करण लागग्या। वैवार में जोड़-जुगत कोनी रैयी। ‘चोटी करै चम्म-चम्म विद्या आवै घम्म घम्म’ री जिग्यां ‘मुन्नी बदनाम’ होयगी। हळ, चवू, बीजियो अर बांसियै री जिग्यां ट्रैक्टर, कल्टी अर हेरै लेयली। आदमी रो आध्यात्मिक पख भी सैंगण मैंगण हुयो है। कथा-भागवत अर मिंदर-मस्जिद मांय भी ढकोसला अर कोकड़ उतरग्या। मिनख री मूळ में भूल लखावै। जिंदगी री अबखायां मांय होय सकै कमी आई है, नयी-नयी मशीनां, वैज्ञानिक प्रयोग अर इंटनेट री न्यारी दुनिया ऊपड़ी है पण आदमी री दोघाचिंती, चिळ्डघाणी अर खेंचाताणी बधी है। आदमी आजाद हुय’र भी गुलाम बण्यों है। पैलां बिच्चै आज आदमी अेकलो पड़्यै है, मिनख री हिम्मत अर जूझण री तागत मोळी पड़ी है। राजनीति, शिक्षा अर संस्कार रै पासै नाड़ बूकीयै में आयोड़ी है। खासकर धर्म अर अध्यात्म रै खेतर में आपां साव नागाचागा हां। बूढ़ा-बडेरा थोड़ी खोड़ तो खुड़ांवता हा अबै पाडियो पून में आयोड़ो है।
‘धर्मो रक्षति धर्मः’ री मरजाद भी ढीली पड़ती दिसै। कथा-भागवत में डाकुआं रो पगफेरो चौगड़दै आड फेरी देय राखी है। कथा बांचणिया री ‘क्वालिफिकेशन’ कुण जांचै? सगळा धरम-करम रै नसै में धुत हुयोड़ा है। निरा कोरा नाचै-उछळै। घण्टा-घण्टा तांई मेक-अप अर पाउडर कर’र महाराज व्यास पीठ पर पधारै। चोखा पळगोड हुयोड़ा। चिमठी सू नारेळ फोड़ देवै इस्या। गळो फाड़-फाड़’र लूखा उपदेस करै। आपरै जीवन में चिन्ही’क कोनी उतारै बात। फिल्मी गाणां पर भजन। लुगायां-आदमी चैनल पर फोटू आवण रै चक्करां में नाचबो करै। केई-केई तो कथावां में फकत नाचण ही जावै। रोट्यां रा खरूंदा, पंचोळगारा अर बेरोजगार लोगां री भीड़ नै आस्था रै ऊंचै आसण बैठणियां ग्यान देवै। हां, इण देस में धर्म-कर्म अर अध्यात्म री समझ राखणियां घणाई जाणकार हुवैला पण दिखै अर चालै अबार अै मोटै झिंटा अर मोटी कायावाळा उपदेसक ही है। चपरासी री नौकरी लागण खातर केई तरै रा इम्तिहान अर पढायां व्है पण आस्था अर श्रद्धा रै सिंहासण बैठणियां गीत गा-गाय’र नाको काढै। मिंदरा में मेळै-मगरियै री बगत-तकड़ी भीड़ भेळी हुवै। सांवठा जातरी आवै, सांवठो चढ़ावो आवै। सोनै-चांदी रा छत्तर चढ़ै। लाखूं आदमी-लुगाई पैदल जातरी जावै। उणारी आस्था नै नींवण पण सौ-सौ कोस उपाळो चाल’र आवणियै भगत नै तीन-तीन दिन लैण में लाग’र दरसण करणा पड़ै अर दूजै कानी हैलिकॉप्टर सूं जमीन पर उतरिया वी.आई.पी. भगत सणै परिवार हाथो-हाथ दरसण कर’र घरै व्हीर हुवै जावै उण बगत मिंदर में सोने रै आसण विराजणियो भगवान कांई कर रैयो हुवै? आस्था रो बाजारीकरण, ईश्वर रो पेटेंट कोई आच्छी बात तो कोयनी। मिंदरां में चढ़णवाळो प्रसाद मिंदर सूं दुकान अर दुकान सूं मिंदर व्यावसायिक चक्कर काटतो फिरै। मिंदर-मस्जिद जैड़ी संस्थावां भीस्टीवाड़ै अर वी.आई.पी. कल्चर री भेंट चढ़गी। दिखावट अर आडम्बर धर्म-कर्म नै आंधो कर राख्यौ है। चैनल पर आंवां ही कथा बांचणियां री रेट बधै। कथावां में पूरो रो पूरो बाजार सागै फिरै। चाय, पूड़ी, सब्जी सूं लेय’र पोथी, माळा, नग, दवायां जैड़ी चीजां बिकणी आम बात है।
दूजै कानी जागण-जम्मा अर सत्संग कीरतन भी ‘हाइटेक’ हुयग्या। पेलां जकी थोड़ै चढावै अर भेंट रै पछै भी जागणियां री निस्ठा अर समर्पण हुंवतो बो अब्बै गायब है। ठाडो स्टेज, पळकती लाइटां ही लाइटां, कान फाड़तो साउण्ड। स्टेज माथै भजन गावणियो इयां ऊतरै जाणै सुरग सूं भगवान खुद आ बावड़्या। तरै-तरै री ट्यूनां, लाइटां रो घूमणो फिरणो, मोटी स्क्रीनां रै मारफत धोळफूलियो कलाकार आय’र का तो कोरी ताळ्यां बजवावै का सूका जैकारा लगवावै। द्वअर्थी अर हळका चुटकला भळै। जागण में जावणियां में भी मोटी जमात दारू उगावणवाळां री या कोई दूजै मतळब सूं। कुल मिला’र जागण जम्मा आस्था-श्रद्धा रा मंच नी रैयां। थोथो आडम्बर, मौज मस्ती, नाचणो-कूदणो अर ऊतफांगड़ा ही रैयग्या। ईश्वर मन सूं निकळ’र सरीर में बड़ग्यो।
मीराबाई, रैदास, कबीर, तुलसी, करमा बाई री भगति रा मारग लोगां रोक दिया। यांत्रिकता रै बूतै कोरो रोळो बापरग्यो। धरम-करम में टीकली कमेड़ी बण्योड़ा ठेकेदार फकत स्टैण्डर्ड में भीज्या फिरै। धरम बांटै कोयनी, धरम जोड़ै। धरम आफत में जीणो सीखावै–
धीरज धरम मित्र अरू नारी।
आपद काल परखिए चारी॥
दूर दराज रै देहात में हुवणवाळै सत्संग में भी बीड़ी, जरदो अर चिलम रो खुल्लो अर चौड़ै-धाड़ै जोर। मोटा अर ठाडा लाउडस्पीकर लगा’र किणनै सुणावां हां आंपा? आपणी धार्मिकता दिखावै री जबरी सिकार नीं तो कांई है? भक्ति अर धर्म रो रोळैरप्पै सूं कांई काम? भक्त किणीनै परेसान कोनी करै। भक्त वो है जको विभक्त नहीं हुवै। छेकड़ आपां आडम्बरां रै पाण किंयां जीय सकां? धर्म चैनलां पर ग्यान बघारतां ढोंग्यां कन्नै कोयनी। धर्म मिंदर अर मस्जिद री चौखट पर भोड फोड़्या भी कोयनी। आप आपरी साधना अर उपासना पद्धतियां हुवै सकै पण हृदय रो धर्म, मन रो धर्म अर काळजै सूं नीकळेड़ो धर्म सांचो धर्म हुवै। दरिद्र नारायण री पीड़ नै समझणो अर मदद करणो सांचो धर्म है। हारी-बैमारी में माख्यां भिणभिणावतै मिनख नै आप दोय घड़ी ही मुळका सक्या तो रामजी राजी। बूढै-बडेरै री झीणी सोझी अर मांदगी में आप आडा आय सको तो बड़ी बात। बड़ी बात मोटी धरमसाळा चिणावणै में नहीं पण कोढ़ियै दुखियारी री आंख्यां में साझै दुःख रा गळगळा आंसू निकळग्या तो है। मानवता अर इंसानियत रो तकाजो है कै सगळी जिंग्या बडाई, कूड़, गप्प अर आडम्बर ही दिखै। सगळां संता-मेहता आ ही बात बताई कै खुद नै परायै रै दुःख री लौ में बाळ’र ऊजाळो, मिनख-मानवी रो परमार्थ करो। माळा-मिणियो, तीर्थ जातरा सूं ठाडो अर महत् कारज है– दीन-हीन री सेवा में गळनो। दूजै रै पगथळी में कांटा गढ्यां, आपणी आंख्या में चोसरा चालै आ ईज मोटी सेवा-सहानुभूति है। अेक संत केवै–
‘जेठ बैसाख के महिनै में किसान के माथे से टपकती पसीने की बूंदो में प्यारा गोपाल बंशी बजाता मिलेगा।’
मानवता खातर जीवणो, फोड़ो देखणो, पराई पीड़ नै आपरी पीड़ मानणी सोरी कोनी पण आं चीजां में इत्तो संतोस, इत्तो आणंद है कै हरेक रै बस रो सौदो कोयनी कै आ मौज लूट सकै। सेठिया जी लिखै–
तिल-तिल कर डोरो बढै, आँसू नाखै मेण।
झरै पराई पीड़ में, बै ई आच्छा नैण॥
आस्था अर श्रद्धा मन-आत्मा री अलौकिक अनुभूति हुवै। आपरै असवाड़ै-पसवाड़ै री रीतां-रिवाजा, देखादेखी होड़ अर गांव करै ज्यूं गैली करै री धारणां पर आधारित कोनी हुवै ईश्वर निष्ठा। औ ईज कारण है कै भगवान रामचन्द्रजी बूढ़ी भीलणी सबरी रा बोरीया खाया, पत्थर री सिल बणियोड़ी अहल्या नै तारी अर जंगळ-रोही में रेवणवाळी भोळी, अणपढ़ अर असम्य कहीजणवाळी कौम रै नेता निषादराज सूं मेळ-मुलाकात करी। गीता रो उपदेस देवणवाळो किशन गांया रो गुवाळ बणियो, मदर टेरेसा कोढ़ियां री सेवा कीन्ही। इण खातर धरम-करम मिनख-मानवी री सेवा अर थाकल-दूबळै री तिथ लेवण मांय ज्यादा है पण एल.पी.जी. (उदारीकरण, निजीकरण अर वैश्वीकरण) री अवधारणावां रै आयां पछै स्सौ कीं यांत्रिक अर स्टैण्डर्ड हुयग्यो, जकी आच्छी बात नी है। जागण जम्मा अर सत्संग रै फरेबी अर दिखावटी रोकै में आपां कित्ताक धार्मिक अर आस्तिक दिखां? इणरो आत्मावलोकन जरूरी है। मन रो मथवाळ, आपो-आप सूं जूझणो कमतर किंया हूयो? परायै री पीड़ नै देख’र मन-मगजी किंया गळगळी नीं हुवै? अेकै कानी आपां ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ नै माना-जाणा पण दूजै कानी भौतिकतावादी चकाचौंध अर फुटरापै रै चक्कर में धर्म री मौलिक अवधारणावां रा लेवड़ा ऊतरण लागग्या। तीर्थ-जातरा नै पिकनिक मानण री मानसिकता भारत री तो कोयनी ही । ‘यूज एण्ड थ्रो’ रो सिद्धान्त चीज-बस्त रै सागै- सागै मिनखपणै में भी आंवतो दिखै। आपांनै पिछम रो अंधानुकरण भी कोनी करणो। पूरब रो अध्यात्म अर पिछम रो विग्यान मिल’र नयी रचना अर सिरजणा कर सकै पण कोरो-मोरो पिछम रो दरसण आपानै हाण्डीहेत कर’र छोड़ सकै। सगळां सूं घणो थोथ, धर्म रै मामलै में दिखै। नया-नया चैनल, नया-नया गुरू-घंटाळ अर नयी-नयी व्याख्यावां! गुरू अर बाबावां में सामन्तशाही रो निरवाळै ढंग रो रूप चाल पड़्यो। आपांनै पढणो-लिखणो पड़सी। कोरो थूक बिलोयां सूं पार कोनी पड़ै। बहसां में मोटी-मोटी बघारणवाळा धार्मिकता रै पासै घणा बोछरड़ा अर माजणो देंवता लाधै। मिंदरां अर जागणां में अणहूंतो पंचोळ करणवाळा सैसूं ज्यादा अधार्मिक लाधै। ‘सेकुलरिज्म’ रो झण्डो ऊंचायां फिरणवाळा घणा लखणा रा लाडा है। इण खातर आपांनै गीता, कुरान, बाइबल अर बीजी धार्मिक पोथ्यां पढ्यां पछै सार काढ़णो चाहिजै अर राय बणावणी चाहिजै न कि दूजां रै देखादेखी।
धर्म बाजारवाद री भेंट चढग्यो। विज्ञापन री संस्कृति काया नै स्सों की बणाय दी। आपणा धार्मिक ग्रन्थ काया अर माया नै पाणी रो बुलबुलो बतावै। जिस्म री नुमाइश अर तथाकथित गुरू-घींटाळां रो तीतरी बखेर ग्यान भोंकै मानखै नै चापड़ चून्धो कर नाख्यो। ‘लखता सो वक्ता नहीं अर वक्ता सो लखता नहीं’ री धारणा लोपालोप हूयगी। धर्म चायै किसो ही व्हो ठेकेदारां मरजादा अर मूल भावना री ठीकर्यां-ठीकर्यां खिण्डाय दी। भण्डारा अर जागण रो खरचो वैज्ञानिक सोच नै पिंदै बैठावण लागर्यो है। आजादी रै बाद पोसाळ अर शिक्षा घणी बधी पण डाफाचूक अर आंधो विसवास भी तुरळ उपाड़ राखी है। जांभोजी, तेजोजी, गोगोजी अर रामदेवजी सूं लेय’र मींमासाकारां कानी सूं बताइजेड़ो गैलो अबै चडूड़ कोनी दिसै। आदमी धार्मिक पख सूं हाण्डीहेत हुयग्यो। ‘गैली गांव न बाळी, भली चितारी’ री बात जोर पकड़गी। जित्तो जनजागरण अर छापोखानो जोर पकड़्यो बीं सूं बत्ती डोळबायरी मानसिकता गिगनार चढ़ती दिखै।