बीकानेर री हवेलियां रै निरमाण में मुगल, हिंदू अर यूरोपियन स्थापत्य रौ अनोखौ संगम देखण नै मिळै। आभै अड़ती हवेलियां रा कलात्मक गोखड़ा, छाजा, जाळी-झरोखा अर कांगरा देखण वाळां रा मन मोह लेवै। जैसलमेर रै अलावा पूरै शेखावाटी क्षेत्र में शिल्प अर स्थापत्य री आ अमोलक संपदा बिखरी पड़ी है। इणांनै देखण सारू संसार रा दूर-दूर देसां सूं पर्यटक राजस्थान आवै। इण आलेख में अबकाळै फगत बीकानेर री हवेलियां रौ वर्णन दियौ जाय रैयौ है। इणी’ज भांत आगलै अंकां में दूजै क्षेत्रां रै शिल्प अर स्थापत्य री जाणकारी ई दिरीजती रहसी।
केपटन पी.डब्लू. पावलेट सन 1874 रा ‘बीकानेर गेजेटियर’ में इण नगरी री तारीफ करतां लिख्यौ है के सन 1808 में ‘अेलफिस्टन मिशन’ बीकानेर आयौ तो मिशन रै सदस्यां में इण बात माथै विवाद रैयौ के दिल्ली नगर मोटौ के बीकानेर? इण विवाद रौ कारण आज समझ में आवणौ दोरौ है। कारण के आज तो दिल्ली भारत री राजधानी होवण रै सागै अेक महानगर बणग्यौ है अर बीकानेर अबै उणरै समोवड़ में कोई वखत नीं राखै।
छतांपण आज ई जे कोई विदेसी सिंझ्या री वखत नागौर रै रस्तै बीकानेर पूगै, भीनासर किसमीदेसर होयनै लिछमीनाथ जी री घाटी चढै अर भुजिया बजार, मोहता चौक होवतां दाऊजी रै मंदिर सूं कोटगेट होयनै जूनागढ पूगै, पछै उणनै जे रात रै अंधारै में गजनेर ठैरायौ जावै तो वो प्रभावित हुयां बना नीं रैय सकै।
इण बाबत कीं कैय नीं सकां के बीकानेर में ‘अेलफिस्टन मिशन’ रौ मारग कांई रैयौ होसी, पण जे ऊपर लिख्या मारग सूं परिभ्रमण करनै कोई बीकानेर नै देखै-परखै तो इण नगर री बसावट अर स्थापत्य सूं जरूर प्रभावित होवै। पग-पग माथै रामपेठ सूं ऊपर उठ्या विशाळ मंदिर, आभै अड़ती हवेलियां रा कलात्मक गोखड़ा, छाजा, जाळी-झरोखा अर कंगूरा देखण वाळां रा मन मोह लेवै।
इण नगरी री हवेलियां रा वखाण कियां पैली इणरै जनम री कथा जाण लेवणी उचित रहसी। 16 वीं सदी मांय आथूणै राजस्थान में राठौड़ां रौ डंकौ बाजतौ। उण वखत जोधपुर नगर रा संस्थापक राव जोधाजी रौ बेटौ राव बीकौ इण जांगळू प्रदेस री राती घाटी तांई आयौ। उणरी मंसा अठै बस्ती बसाय'नै नुंवौ राज थापन करण री ही। पण इतिहास ओ बतावै के उणरी आखी उमर लड़ाई झगड़ां में ई बीतगी पण वो कोडमदेसर नगर (आज रौ बीकानेर) नीं बसाय सक्यौ।
सन 1593 में लिख्योड़ी ‘कर्मचंदवंशोतकीर्तनक’ कविता में ओ उल्लेख मिळै के कर्मसिंह बच्छावत अठै बस्ती बसावण तांई घणी कोशिश करी। जिण ठौड़ आज बीकौजी री टेकरी है, उठै उण अेक अत्रक्षेत्र खोलियौ, लोगां नै मजूरी देवण तांई ‘चिंतामणि’ अर ‘संभवनाथ’ रा मंदिर बणाया जका 14 बरसां में जायनै पूरा हुया। इणसूं ई पैली भांडाशाह ‘सुमतिनाथ’ रौ मंदिर बणायौ जकौ सन 1514 में पूरौ हुयौ। ओ विशाळ मंदिर राणकपुर मंदिर री डिजाइन मुजब बण्योड़ौ है। पण इतरी कोशिशां रै उपरांत ई अठै कोई खास बस्ती नीं बसी।
दरअसल बीकानेर बसण री प्रकिया 16 वीं सदी रै छेवाड़ै जावतां सरू हुई। उण वखत गंगागेट रै मांयनै बच्छावतां री हवेलियां बणी। निरमाण रै काम में पाणी री घणी अबखाई ही। बच्छावतां रांगड़ी चौक में मीठै पाणी रौ अेक कुवौ खुदवायौ। पछै बैद अर कोठारियां आपरा गुवाड़ बसाया, इणांसूं आगै मोहता, पुरोहित, डागा, मूंदड़ा अर परिहार अर पुष्करणा ब्राह्मण वसिया। मोहतां रौ कुवौ, भैयाजी रौ कुवौ सोनगिरी कुवौ अर केशुराव रौ कुवौ उण वखत ई खोदीजिया। बाद में औरूं कई कुवा खोदीजिया, जिणसूं पाणी री दिक्कत मिटी।
सन 1755 में बीकानेर राज में भारी दुकाळ पड़्यौ। इण बरस बीकानेर नगर री शहरपनाह रौ निरमाण हुयौ। इणसूं पैली महाराजा करणसिंह अर अनूपसिंह रै वखत में नगर में घणौ कलापूर्ण निरमाण हुयौ, बीकानेर किलै रौ मांयलौ निरमाण घणकरौ उगणीसवीं सदी रौ है। महाराजा रतनसिंह, सरदारसिंह, डूंगरसिंह अर गंगासिंह री इण निरमाण में प्रमुख भूमिका रही।
आज बीकानेर रौ सरूप मोकळौ बदळग्यौ है। सन 1874 में पावलेट इण नगर रौ शहर पनाह साढी तीन मील रै वेरै में बतायौ है। इणमें प्रमुख दरवाजा कोटगेट, नत्थूसर गेट, सिवाळगेट अर गोगागेट बताया है। इणरै अलावा तीन बारियां रौ उल्लेख कियौ है— हमालां री बारी, उस्तां री बारी अर कसाइयां री बारी।
इण शहरपनाह रै घेरै में इज बीकानेर री जगचावी कलापूर्ण हवेलियां बण्योड़ी है। इणां में कोठारी, सेठिया, बांठियां, गुलेच्छा, रामपुरिया, डागा, बागड़ी, मोहता अर मूंदड़ां री हवेलियां घणी प्रसिद्ध है। इणरै अलावा पुष्करणां अर छ: न्याति ब्राह्मणां रा मकान ई घणा सांतरा अर उल्लेखजोग बण्योड़ा है।
बीकानेर नगर रौ वो जूनौ इलाकौ जठै खासकर नै ओसवाळां अर माहेश्वरियां री हवेलियां बण्योड़ी है, वे डोढ सौ सूं ढाई सौ बरस जूनौ है। अे हवेलियां बणावती वखत बणावण वाळां री कांई मंसा रही होसी, वा तो कीं नीं कैयी जाय सकै पण आ बात सुभट है के यांनै बणावण में मैणत अर लगन रै सागै वांरी गेहरी भावनावां जुड़्योड़ी रही। इण वास्तै अे हवेलियां स्थापत्यकला रौ अनूठौ नमूनौ बण सकी।
इण हवेलियां रै निरमाण माण में मुगल, हिंदू अर यूरोपियन स्थापत्य रौ अनोखौ संगम मिळै। उण वखत ओसवाळां जिकौ हवेलियां बणाई है, वां में ‘मथेरण चित्रामकला’ रौ काम विशेष है। पण आ कला इतरी प्रभावशाली कोनीं। इसौ लखावै जाणै इण कला रै जाणकार कलाकारां रौ ज्ञान घणौ गहरौ कोनीं हौ। इण भित्ति चित्रामां में कोई पात्र रौ नाक लांबौ निंगै आवै तो कोई री गरदन। छतांपण आ कला उल्लेखजोग जरूर है।
इणरै पछै बणी हवेलियां रै भित्ती चित्रामां में उस्ताकला रौ प्रभाव बेसी है। उस्ताकला प्रमुख रूप सूं मुगलशैली सूं प्रभावित है। इण कला रा कारीगरां नै आपरी कला रौ आछौ ज्ञान हौ। इण वखत जिकौ हवेलियां बणी, वांरै स्थापत्य अर भित्ति चित्रामां माथै मुगलशैली रौ प्रभाव सुभट लखावै। मेहराबदार दरवाजा-बारियां, जाळी झरोखा अर नक्काशी मुगल स्थापत्य रा आला नमूना है। उस्ताकला में कारीगर जिप्सम में अेक तरै रौ मसालौ मिळाय नै काम करता। इणनै ‘आलौ-गीलौ’ काम कैवै। इणसूं बारीक सूं बारीक काम में ई घणौ उभार आय जावै। भित्ति चित्रामां में नैनी-नैनी पत्तियां री कोरणी देखतां ई बण आवै, इण भांत इण हवेलियां री बणावट, सजावट अर कोरणी में घणौ कलात्मक अर कारीगरी रौ काम हुयौ है।
उगणीसवीं सदी में जद अंग्रेज अठै आया तो वांरै संपर्क सूं स्थाप्तय कला माथै युरोपीय प्रभाव ई पड़्यौ। खासकर भित्ति चित्रामां में कोट, पेंट अर बंदूकधारी चित्राम उकेरीजण लाग्या, इणरै अलावा यूरोपियन इमारतां रै अनुरूप आं हवेलियां री बणावट में ई खासौ बदळाव आयौ। महाराजा सरदारसिंह रै राज में तो अंग्रेज अफसर अठै कायम रूप सूं रैवण लागग्या। इणसूं इमारतां में घणो बदळाव आयग्यौ।
बीकानेर नगर रै जूनै मोहल्लां मसलन ओसवाळां रौ मोहल्लौ, मोहता चौक, सुराणां रौ गुवाड़, गोलेच्छां रौ चौक, नाहटां रौ गुवाड़, डागा अर मूंधड़ां रै चौक इत्याद में मोकळी कलात्मक हवेलियां आयोड़ी है। इण हवेलियां रै निरमाण में घणकरौ लाल भाठौ काम में आयौ है, जकौ बीकानेर सूं 61 किलोमीटर आंतरै लूणकरणसर तहसील रै दुलमेरा गांव सूं लायोड़ौ है। ओ भाठौ विशेषरूप सूं इण कारण काम में आयौ है के औ अठै सस्तौ पड़ै अर कोरणी वास्तै उत्तम है। इणरी तुलना जोधपुर अर जैसलमेर रौ भाठौ अठै लायां खूब मूंघौ पड़ै। हवेलियां री नींव खोद’र पैली उण में जूना मकानां री बारीक दुमट माटी भरीजती। आ माटी नींव सारू खूब मजबूत अर माफिक मानीजै।
हवेलियां में हुयोड़ौ सगळी तरै रौ काम कारीगरां री लगन मैंणत, निष्ठा अर कुशळता रौ प्रतीक है। कारीगरी री अेक अनोखौ नमूनौ है। बीकानेर री हवेलियां सही रूप में अनोखी स्थापत्यकला अर शिल्प कला रौ अेक नमूनौ है। भवन निरमाण कला रौ अेक अनमोल खजानौ है। लाल भाठै माथै कियोड़ी बारीक खुदाई नै देख’र पर्यटक अचूंभै में पड़ जावै। मेहराबां, झरोखां अर जाळियां में हुयोड़ी बारीक खुदाई अर झीणौ चित्रांकन देखणजोग होवण रै सागै बेजोड़ है। कलाकारां आपरै टांगी अर हथोड़ै सूं भाठै नै इण गत टांच नै त्यार कियौ है—जाणै भाठै माथै कविता मांड दी है। इण हवेलियां में नीचै सूं ठेट ऊपर तांई री कारीगरी अर अलंकरण कला नै जाणै सवीज बणाय दी है।
हवेलियां रै मांयनै भीतां माथै सै ठौड़ ‘आला-गीलौ’ कियोड़ौ है। आ अेक स्थायी सजावट है। कारीगरी भींता माथै लाग्योड़ै चूनै रै ऊपर करी जावै। ओ चूनौ ई कोई साधारण चूनौ नीं होय’र बीकानेर रौ अेक मजबूत किस्म रौ जिप्सम पलास्टर है, जकौ सैकडूं बरसां तांई नीं उखड़ै।
भींतां माथै चूनौ करती वखत ई आला गीला रा चित्रामकारी रौ काम करीजै।
इणरै अलावा हवेलियां री भींतां माथै मुगलशैली, किशनगढ शैली अर विदेसी शैली रा चित्राम ई देख्या जाय सकै। चित्रामां रै सागै गुंबदां अर मेहराबां में खिल्योड़ा फूल ई घणी शोभा देवै। जाळी झरोखां री बारीक नक्काशी सगळां रौ मन मोह लेवै।
भींतां माथै कियोड़ौ रंगरोगन रौ काम ई इतरौ बढिया अर टिकाऊ है के जाणै अबार ई हुयौ है। हवेलियां में पड़ी वाइनवुड री कुरसियां देखण में भारी भरकम लागै पण उठायनै देखां तो सफा फोरी-फराक लागै। इण कुरसियां माथै कियोड़ी बारीक कारीगरी ई देखणजोग है। हवेलियां रा भित्तिचित्राम तो जगचावा ई है, जिणांनै देख’र लोग इण कला नै लखदाद देवै।
पण अबै कीं हवेलियां नै छोड़’र बाकी री सै हवेलियां धीरै-धीरै उजड़ री है। जिण थोड़ी घणी हवेलियां रौ रखरखाव ठीक है वे तो फेरूं ई ठीक हालत में है, पण बाकी जिणां में परिवार रैवै—वे फगत इणांनै आपरै रैवास रौ साधन मानै। यांरै कलात्मक पक्ष रै अैतिहासिकता कानी वांरौ अंगांई ध्यान कोनीं। इणांरी अनूठी कला री रक्षा करणी तो आगड़ी गई पण जे कठैई टूट फूट होय जावै तो ई उणरी मरम्मत करावणी उचित कोनी समझै। इणरौ कारण ओ ई है के वांरी निजरां में इण कला री कोई कीमत कोनी। वे इणरै महत्व सूं अंगांई अणजाण है। इणरै अलावा हवेलियां में लाग्योड़ा अैतिहासिक चित्राम संगमरमर री मूरतां अर हिरणां इत्याद जंगली जिनावरां रै कलात्मक चित्राम माथै खेखी जमरी है। मौसम रौ प्रभाव दिनोदिन वांनै खाय रह्यौ है। सागण ओ ई हाल काच माथै कियोड़ी सोनै री मीनाकारी रै काम रौ है।
भविष्य सारू इण परंपरागत कला नै जीवती राखण खातर इण हवेलियां री रक्षा करणी घणी जरूरी है। जिण भांत आज राज अर समाज दोनूं कानी सूं यांरी अवहेलना हुय री है उण हिसाब सूं तो कला रौ ओ अमोलक खजानौ बेगौ ई नष्ट हुय जासी।