राजस्थानी लोकनाट्य ख्याल बाबत घणौ कीं लिख्यौ जा चुक्यौ है अर लिख्यौ जा ई रैयौ है। किणी ई छेत्र री लोकनाट्य परंपरा नै आपां फगत उण छेत्र री संस्कृति रै घेरै में रैय’र ई गैराई सूं नीं समझ सकां। इणरै वास्तै आपां नै लारै-आगै च्यारूं मेर निजर दौड़ावणी पड़सी। कारण के ‘लोक’ सबद ई इत्तौ व्यापक है के उणरौ छेह पावणौ ई मुस्किल। पछै परोक्ष-अपरोक्ष रूप सूं आदान-प्रदान ई तौ लगौलग चालतौ रैवै। इण वास्तै आ बात लाजमी हो जावै के जिण ‘लोक’ बाबत आपां विचार कर रैया हां, उणनै गैराई सूं समझता थकां, उणरी निजू खासियतां नै पूरी-पूरी ध्यान में राखता थकां, उण संपूरण संस्कृति रै सापेक्ष उणरौ अध्ययन कर्यौ जावै जिणरौ के औ अेक अंग है। इणरै साथै ई विस्व लोक साहित रै लोक तत्वां नै ध्यान में राखता थकां विस्व लोक साहित री इतियासिक जात्रा रै समानान्तर इणरी इतियासू जात्रा रौ विश्लेषण करणऔ पड़सी।
उपलब्ध साहित में सैं सूं पुराणौ ‘ऋग्वेद’ मानीजै। वैदिक काळ रै कर्मकांड माथै निजर फैंकियां औ सुभट दीसै के उण जुग में ईं लोगां में निरत अऱ नाटकां रौ प्रचार हौ। अेक छोटौ-सो अभिनय प्रसंग सोम याम रै मौकै आवै। ‘सोमकयण’ रै इण प्रसंग में तीन पात्र होया करता—जजमान, सोम बेचणियौ अर अर्ध्व्यु। आ बात ठीक है के आ जग्य संबंधी ई अेक क्रिया ही, पण ही अभिनय जैड़ी ई। ‘ऋग्वेद’ में अलेखूं सूक्त अैड़ा है, जिणां में न्यारै-न्यारै सगसां रा आपस में कथोपकथन है। आं ईं सूक्तां नै ‘संवाद सूक्त’ कैवै। अर आंमै नाटकीय अंश मौजूद है। आं रै अलावा ई वैदिक साहित में केई जगै अैड़ा प्रसंग मिलै, जिणां सूं वैदिक काळ में लोक नाट्य परंपरा सिद्ध होवै।
वैदिक साहित रै बाद लौकिक साहित ‘रामायण’ अर ‘महाभारत’ इत्याद में ईं उदाहरण मिलै। संस्कृत रै आदकाव्य ‘रामायण’ (बाल कांड 14/5) में नाटकां रौ उल्लेख है। ‘महाभारत’ रै खिल भाग ‘हरिवंश पुराण’ में ‘रम्भाभिसार’ नांव रै अेक अभिनय रौ काफी लंबौ वरणन मिलै। पतंजळि रै महाभाष्य में ‘कंस-वध’ अर ‘बलि-बंध’ नांव रै नाटकां रा जिकर तौ मिलै ई, साथै ई अभिनय बाबत ई संकेत मिलै। ‘कामसूत्र’ में वात्स्यायन ई ‘नागरक’ रै मनोरंजन रौ बरणन करतां पख या महीनै रै किणी चावै दिन सरसती रै मिंदर में उच्छब (समाज) रै होवण भर उण बगत बारै सूं आयोड़ै नटां रै नाटकां रै प्रदरसण रौ जिकर कर्यौ है।
प्रसंग मुजब अठै नाटक री उतपत अर लोगां में इत्तै चाव-मोह बाबत चरचा करणी ई सारथक रैसी। नाटक री उतपत बाबत आपां रै अठै कीं कथावां परंपरा सूं चालती रैयी है। आंमै सै सूं पुराणी भरत रै नाट्यशास्त्र रै परथम अध्याय में लाधै। संसारी मानखै नै हदभांत ई अणमणौ देख’र इंदर देवता बिरमाजी कनै जा’र अेक अैड़ै वेद रै निरमाण करण री प्राथना करी, जिण सूं के वैद रै अणधिकारी स्त्री, शूद्र इत्याद सगळां रौ ई मनोरंजन होय सकै। औ सुण’र बिरमाजी च्यारूं वेदां रौ ध्यान कर’र ‘ऋग्वेद’ सूं पाठ्य, ‘सामवेद’ सूं गाण, ‘यजुरर्वेद’ सूं अभिनय अर ‘अथर्ववेद’ सूं रस लेय’र ‘नाट्यवेद’ नांव रै पांचवैं वेद री रचना करी। वैला—पैल खेल्या गया नाटक हा ‘त्रिपुरदाह’ अर ‘समुद्र-मंथन’।
संस्कृत री अेक उगती ‘काव्येषु नाटकं रम्यम्’ बौत ई चावी है। इणरै अलावा अेक उगती ई चावी है—‘नाटकान्तं कवित्वम्’। तौ नाट्य विधा दूजी विधावां सूं इत्ती महतपूरण क्यूं मानीजी, इणरै लारै केई कारण रैया। अर वां कारणां में सूं सै सूं मोटौ कारण रैयौ नाटक रौ हरेक सगस सारू होवणौ यानी सार्वजनिक मनोरंजण होवणौ। दूजौ जकौ महतपूरण कारण रैयौ नाटक रौ लोकवत रौ अनुकरण होवणौ। इणी कारण काळिदास ‘नाट्य भिन्नरुवेर्जनस्य’ कैय’र नाटक नै न्यारी-न्यारी रुचियां वाळै लोगां सारू अेक आम मनोरंजण रौ साधन बतायौ। यूं तौ नाटक रा केई भेद मिलै, पण स्वरूप बाबत विचार करां तौ खास करनै च्यर रूप सामी आवै-गद्य नाट्य, पद्य नाट्य, गद्य-पद्य नाट्य अर राग नाट्य (गीति नाट्य)। भाव नाट्य या निरत नाट्य इत्याद री चरचा अठै अप्रासंगिक होवैला क्यूं के अै संवाद (कथन) शून्य नाट्य है।
इण भांत ‘ऋग्वेद’ सूं लगा’र लौकिक साहित रौ अध्ययन करियां आपां रै सामी सरू-सरू रै लोक नाट्य री झलक मिलै। अर वीं में आपां लोक नाट्य रै तत्वां राबीज ई स फ ओळख सकां। दरअसल कोई ई विधा या कला रौ शास्त्रीय स्वरूप ‘लोक’ सूं ईं बणै। ‘लोक’ माथै करड़ाई सूं कायदा-कानून लागू होवतां ईं वौ शास्त्रीय बाजण लागै अर वीं रौ रस्तौ जुदौ हो जावै। सरू-सरू में नियमां में बंध्योड़ा आछा लागै, बाद में वै ‘पैटर्नाईज्ड’ हो जावै अर जावै धीरै-धीरै आपरै आकर्षण गमायदे। औ ई कारण है के संस्कृत साहित में लारला केई नाटक ‘पैटर्नाईज्ड’ रै सिवाय कीं नीं लागै। पण जे उणमें परिस्थितियां मुजब लगौलग जुड़ाव-घटाव होवतौ रैवै तौ आ स्थिति कम आवै, या नीं आवै। इणी कारण लोक नाट्य कदैई ऊबाऊ या बासी नीं लागै।