गणेश्वर नीमका थाना (सीकर) से 15 किलोमीटर तथा जयपुर से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ है। यहाँ कांटली नदी के मुहाने संस्कृत पाठशाला के उत्तर में स्थित टीलों में ताम्रयुगीन उपकरण मिले हैं, जिनकी संख्या 2 हजार हैं। ऐसे ताम्र कुल्हाड़े अन्यत्र कहीं भी प्राप्त नहीं हुए हैं। यहाँ गैरिक रंग के मृद्भाण्ड भी प्राप्त हुए हैं। ताम्र उपकरणों में तीर, बाणाग्र, चूड़ियाँ, छल्ले, बल्लम, दण्ड, फलक, काँटे, छैनियाँ और मणके मिले हैं। देश में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में प्रागैतिहासिक काल के उपकरण प्राप्त हुए हैं। ऐसी ही वस्तुएँ सिन्धु क्षेत्र से भी मिली हैं।
बाणाग्र जो पांच से 6 से.मी. तक के हैं, लकड़ी के डण्डे में लगाये जाते हैं। इनसे शिकार किया जाता थी। कुछ अग्र भाग घुमावदार हैं। इनसे पक्षियों की शिकार किया जाता था। कुछ बाणाग्र छिद्रविहीन भी हैं।
यहाँ की खुदाई में प्रस्तर निर्मित औजार भी मिले हैं। बाणाग्रों की प्राप्ति और प्रस्तर औजारों से ज्ञात होता है कि यहाँ इस काल में बसने वाले लोग शिकार में मिले जानवरों और फलों पर निर्भर थे। कृषि करना उन्होंने नहीं सीखा था। पास ही खेतड़ी में विपुल ताम्र भण्डार प्राप्त थे, जिनका उपयोग ये लोग करते थे। भालों के फलक एवं मछली पकड़ने के काँटे भी मिले हैं। यहाँ 60 फरसे भी प्राप्त हुए हैं।
विद्वानों की मान्यता है कि इंस समय कांटली नदी नोहर के पास दृषद्वती नदी से जा मिलती थी। खेतड़ी जो गणेश्वर से 60 किलोमीटर दूर है— की खानों से निकला ताम्बा काटली नदी के माध्यम से अन्यत्र भेजा जाता था। यहाँ के लोग 2700 ई.पू. में ताम्र उपकरण बनाने में कुशल हो चुके थे। ये उपकरण पाकिस्तान, पंजाब और हरियाणा प्रदेशों में नदी मार्गों से प्रेषित किए जाते थे। खुराड़ा में सन् 1934 में प्राप्त उपकरण यहीं से गये प्रतीत होते हैं। ये प्रायः 2000 ई.पू. के हैं। यहाँ से नालीदार प्याले भी मिले हैं, जिनकी तुलना ईरानी प्यालों से की जा सकती है।
यहाँ से जोधपुरा की तरह गैरिक रंग के मृद्भाण्ड मिले हैं, जो ई.पू. 2000 के माने जाते हैं। इनका निर्माण कुछ पूर्व काल में गणेश्वर में होने लगा था। गैरिक रंग के मृद्भाण्ड वाले लोग हड़प्पा युग के नहीं थे, किन्तु गणेश्वर खेतड़ी क्षेत्र थे। गणेश्वर के बने ताम्र उपकरण और ताम्बा सिन्धु सभ्यता के स्थानों में नदी मार्गों द्वारा पहुँचाया जाता था।
गणेश्वर की खुदाई से एक ऐसी सभ्यता का पता चला है, जो पूर्व हड़प्पा ताम्र काल की है। इसका समय 2800 ई.पू. माना गया है। यह गणेश्वर-जोधपुरा सभ्यता के नाम से जानी जाती है।
गणेश्वर 27°40′ उत्तरी एवं 75:51’ पूर्वी देशान्तर के बीच अवस्थित है। नगर के बाहर छोटे टीले हैं जो मृद्भाण्डों से ओत-प्रोत हैं। यह कालीबंगा से 60 किलोमीटर की दूरी पर है। जयपुर से यह दूरी 150 किलोमीटर की है। यहाँ भी खुदाई में 2 हजार ताम्र उपकरण जो गैरिक रंग वाले मृद्भाण्डों से सम्बन्धित थे—मिले हैं। भारतीय पुरातत्त्व के क्षेत्र में पहली बार हुआ है कि आद्य ऐतिहासिक ताम्र उपकरण इतने विभिन्न प्रकार में प्राप्त हुए हैं और वे भी एक छोटे से स्थान ओ. सी.पी. के साथ। जैसा कि पूर्व में कहा गया है यहाँ से बाणाग्र, भाले का शिरोभाग, मछली पकड़ने के काँटे आदि मिले हैं। बाणाग्र हड़प्पा पूर्व स्तर एवं हड़प्पा स्तर पर भी कालीबंगा में मिले हैं, जो गणेश्वर से द्वारा जुड़ा हुआ है। यह नदी गणेश्वर की पहाड़ियों से निकलकर पूर्व काल में दृषद्वती से मिलती थी। खेतड़ी ताम्र खानें गणेश्वर से प्रायः 60 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित हैं। यहाँ का ताम्बा कालीबंगा में नदी मार्ग द्वारा भेजा जाता था।
गणेश्वर खेतड़ी क्षेत्र में 2700 ई.पू. में ताम्र तकनीक सुचारु रूप से विकसित हो चली थी। ये ताम्र उपकरण हड़प्पा से आये लोगों के उत्पादन नहीं थे तथा न किसी घुमक्कड़ कबीले के लोगों के थे। पास ही ताम्र खदानों से कच्चा तांबा खोदने का काम, उसे गलाने और आकार देने का का बाहरी लोगों के सामर्थ्य के बाहर था। यह स्थानीय लोगों का काम था।
इस सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि गणेश्वर के पास दरीबा, अहीरवाला बालेश्वर, चीपलाटा, बेहर, मोढूका आदि में ताम्र खानें स्थित हैं। दोहन नदी बालेश्वर की ताम्र खानों के उत्तरी भाग से निकलती है। इसके अलावा सोता नदी जो साबी की सहायक नदी है, वह भी अहीर वाला दरीबा ताम्रखानों के दक्षिण पूर्व से निकलती है। इन्हीं नदी मार्गों से सांभर क्षेत्र में बने हुए उपकरण— हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में भेजे जाते थे। स्थल मार्ग से भी कुछ उपकरण जाते थे।
गणेश्वर में मिले ताम्र उपकरण भण्डार नागौर जिले से प्राप्त खुरड़ी संग्रह के मूल्यांकन में सहायक होते हैं। गणेश्वर और जोधपुरा से प्राप्त गैरिक मृद्भाण्ड आकार और डिजाइन में समान हैं। ओ.सी.पी. वस्तुतः कालधारी चित्रित मृद्भाण्ड हैं, जिन पर घना रेखांकन है।
गणेश्वर में हुए उत्खनन ने हडप्पा पूर्व ताम्र तकनीक में एक नया अध्याय जोड़ा है। यह सब 2800 ई.पू. हुआ है। इसका नाम गणेश्वर-जोधपुरा सभ्यता समुचित है। यह कहना उचित नहीं है कि हड़प्पा पूर्व की सभ्यता धातुओं के सम्बन्ध में विपन्न थीं। गणेश्वर और कालीबंगा के ताम्र उपकरण इस बात का स्पष्ट खण्डन करते हैं। गणेश्वर के समान खेतड़ी क्षेत्र में ऐसे और भी केन्द्र होंगे जहाँ ताम्बे के उपकरण बनाये जाते थे।
गणेश्वर में ताम्र उपकरण और मृद्भाण्ड जो गैरिक रंग के हैं, एक साथ साथ मिले हैं। यह स्थल कांटली के ठीक पास स्थित है। यह कहना कि ओ.सी.पी. काटली की घाटी में नहीं है—सही नहीं है। काटली के पास गणेश्वर के उत्खनन से पेन्टेड ग्रे वेयर और ब्लैक एण्ड रैड वेयर स्थान काटली के दक्षिणी तट पर सोनारी जोधपुरा में मिले हैं। इस स्थान की दूरी गणेश्वर से 25 किलोमीटर है।
गणेश्वर से ताम्र उपकरण हड़प्पा एवं मोहनजोदडो सभ्यता के स्थानों में बराबर पहुँचा करते थे, यह बात गणेश्वर में हुए उत्खनन से भली प्रकार से सिद्ध हो जाती है।