राजस्थान में पतंगबाजी एक उत्सव की भांति आयोजित होती है। मकर संक्रांति के मौके पर आसमान में रंग-बिरंगी पतंगें उड़ती हुई देखने को मिलती हैं। जयपुर में लगभग डेढ़ सौ वर्षों पहले तत्कालीन महाराजा रामसिंह द्वितीय द्वारा यह सांस्कृतिक उत्सव आरंभ किया गया था। इस समय आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है और मकानों की छतों पर गीत-संगीत के साथ-साथ तिल-पपड़ी खाने का दौर चलता रहता है। सभी जगह ‘वो काटा’ और ‘चर्खी संभालो’ जैसी आवाजें हवा में गूंजने लगती हैं। हर उम्र के लोग रंग-बिरंगी पतंगें और डोर लेकर छतों पर इकट्ठा होते हैं और दोस्ताना प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार रहते हैं।

जयपुर, जोधपुर और उदयपुर जैसे शहर उत्साह से जीवंत हो उठते हैं और वातावरण संगीत, हंसी और एकजुटता की भावना से भर जाता है। यह खेल सिर्फ बच्चों तक सीमित नहीं बल्कि हर आयु वर्ग के लोग इसमें हिस्सा लेते हैं। यह त्यौहार सामाजिक मेलजोल का प्रतीक है जो सभी उम्र के लोगों को एक साथ लाता है।

राजस्थान में पतंग महोत्सव राज्य के सबसे प्रतीक्षित उत्सवों में से एक है, जो सांस्कृतिक परंपरा और उल्लास का एक अनूठा संगम प्रस्तुत करता है। हर साल जनवरी में मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित होने वाला यह महोत्सव राजस्थान के आकाश को रंग-बिरंगी पतंगों से सजे एक मनमोहक कैनवास में बदल देता है। इसे देखने के लिए दुनिया भर से पर्यटक राजस्थान आते हैं।

पतंग महोत्सव का मुख्य आकर्षण यहां होने वाली अंतर्राष्ट्रीय पतंगबाजी प्रतियोगिता है, जो दुनिया भर से प्रतिभागियों को आकर्षित करती है। इस दौरान आसमान विभिन्न आकृतियों, आकारों और डिज़ाइनों की पतंगों से भर जाता है, जो एक शानदार दृश्य प्रस्तुत करती हैं।
इस महोत्सव में सांस्कृतिक कार्यक्रम, लोक संगीत और लोक नृत्यों का प्रदर्शन किया जाता है जिससे दर्शकों को राजस्थान की समृद्ध लोक परंपराओं की झांकी देखने को मिलती है। यह केवल एक आयोजन ही नहीं अपितु जीवन और सद्भाव का उत्सव है।

जुड़्योड़ा विसै