आस्था मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। मानव की आस्था मूल रूप से सृष्टि का निर्माण करने वाली अलौकिक सत्ता से जुड़ी हुई होती है पर भारतीय जनमानस अपनी आस्था का प्रकटीकरण करने के लिए इसे अलग-अलग स्वरूपों में पूजता रहा है। आस्था की यह धारा भारत में प्राचीनकाल से सतत प्रवाहित होती रही है जिसमें समय-समय पर अनेक तत्व मिश्रित होकर उसे पुष्ट करते रहे।
भारत का ही एक प्रदेश राजस्थान अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रखता है। यहां के लोग वीरता के उदात्त गुणों से युक्त होने के साथ-साथ धर्मपरायण स्वभाव रखते हैं। राजस्थानी जनमानस वैदिक और पौराणिक देवी-देवताओं के साथ-साथ लोक देवी-देवताओं में भी अपार श्रद्धा रखता है। इसके साथ ही यहां संत-महात्माओं और पीरों-फकीरों में भी भारी आस्था देखी जा सकती है।
चूंकि राजस्थान वीरभूमि माना जाता है, सो यहां के लोगों में शक्ति-पूजा के प्रति गहरा झुकाव देखने को मिलता है। यहां शास्त्रोक्त देवी-देवताओं के विशेष आराधक भी हुए हैं जिन्होंने अपने विचारों के आधार पर अलग-अलग पंथ व संप्रदायों का प्रवर्तन करके समाज को नवीन दिशा प्रदान की। राजस्थान में द्वैत एवं अद्वैत दोनों पूजा परंपराओं का चलन रहा है। मध्यकाल में इस्लामी विचारधारा का प्रवेश हुआ और सूफी संतों के प्रचार-प्रसार से यहां धार्मिक समन्वय की गंगा-जमुनी धारा प्रवाहित हुई।
राजस्थानी धरा की यह खासियत है कि यहां ऐसे अनेक विशिष्ट लोगों ने जन्म लिया, जिन्होंने अपने त्याग और बलिदान से समाज में उच्च आदर्शों की स्थापना की। जनसामान्य ने ऐसे विशिष्ट चरित्रों को देवतुल्य मानते हुए उन्हें पूजना शुरू कर दिया। इसी कारण राजस्थान में लोक देवी-देवताओं की संख्या इतनी है कि इनकी गणना करना भी कठिन है। यहां के विभिन्न अंचलों में इनकी स्मृति में मेले भरते रहते हैं जिनमें आस्थावान लोग दूर-दूर से आकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।
राजस्थान में शास्त्रोक्त शक्ति देवियों के अलावा लौकिक शक्तिदेवियों की पूजा भी की जाती है और उनके मेले भरते हैं। इनमें करणी जी, बांकल, आवड़, कामेही, बिरवड़, जीण, आदि प्रमुख हैं। इनके प्रति लोग अपार श्रद्धा रखते हैं और ये लोक देवियों के रूप में पूजी जाती हैं।
मेलों, त्यौहारों और उत्सवों की दृष्टि से राजस्थान एक अनूठा एवं रंगीला प्रदेश है। यहां के मेलों और त्यौहारों की विशिष्ट सांस्कृतिक परम्परा जैसा उदाहरण अन्यत्र मिलना कठिन है। प्रत्येक मेले के साथ लोकजीवन की कोई किवदंती या ऐतिहासिक कथानक जुड़ा हुआ है। इसी के चलते इन मेलों के आयोजन में समूचा लोकजीवन पूरी सक्रियता के साथ सम्मिलित होता है जिससे राजस्थानी संस्कृति जीवंत हो उठती है। प्राय: सभी मेलों से जुड़े अपने लोकगीत जनसामान्य में प्रचलित हैं जो लोक की भावनात्मक आस्था को प्रकट करता है।
बरसों-बरस बीत जाने के बाद भी लोक आस्था के ये स्थल अपनी खास पहचान बनाये हुये हैं और समाज को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बांधने में अपना योगदान दे रहे हैं। यहां वर्ष भर मेले लगते रहते हैं जिनमें लोग उत्साह के साथ शामिल होते हैं। इन मेलों की विविधता को देखते हुये इनका वर्गीकरण धार्मिक मेले, लोक देवी-देवताओं के मेले, संतों और महात्माओं के मेले, सूफी संतों के मेले और पर्यटन से जुड़े मेले आदि शीर्षकों में किया जा सकता है। यहां इस वर्गीकरण के अनुसार मेला-स्थलों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार प्रस्तुत है –
धार्मिक मेले : पुष्कर, जीण माता, भर्तृहरि, डिग्गी कल्याण जी, श्री महावीर जी, शिवाड़, शीतला माता, कैलादेवी, रणथंभौर गणेश मेला, बेणेश्वर मेला।
लोक देवी-देवताओं के मेले : गोगाजी मेला (गोगामेड़ी), रामदेवजी का मेला (रामदेवरा), तेजाजी का मेला (पर्वतसर), पाबूजी का मेला (कोलूमंड), देवनारायणजी का मेला (आसींद, अजमेर, भीलवाड़ा, टोंक), कल्लाजी का मेला (चित्तौड़गढ़), मल्लीनाथ जी का मेला (तिलवाड़ा), करणी माता का मेला (देशनोक), आई माता (बिलाड़ा)।
संतों और महात्माओं के मेले : जांभोजी का मेला (मुकाम), जसनाथ जी का मेला (कतरियासर), संत पीपाजी (पीपाड़), संत मावजी (बेणेश्वर), संत रामचरणदास (आसींद)।
सूफी संतों के मेले : ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती (अजमेर), काजी हमीदुद्दीन नागौरी (नागौर), गलियाकोट का उर्स (डूंगरपुर)।
पर्यटन से जुड़े मेले : मरु महोत्सव (जैसलमेर), मारवाड़ महोत्सव (जोधपुर), थार महोत्सव (बाड़मेर), तीज महोत्सव (जयपुर)।
राजस्थान में आयोजित होने वाले मेलों से जुड़े विवरण से स्पष्ट होता है कि मेलों की दृष्टि से यह प्रदेश काफी समृद्ध है और इनके माध्यम से राजस्थानी लोक संस्कृति की रंग-बिरंगी झांकी देखने का अवसर मिलता है।